जानें ग्यारस से जुडी कुछ खास विशेषताएं

पूर्णिमा और अमावस्या के बाद ग्यारहवां दिन एकादशी के रूप में बनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि, हर 40 से 48 दिन में मानव शरीर को मंडल नामक चक्र से गुजरना पड़ता है. इस चक्र के दौरान तीन दिन बेहद ख़ास होते है. इस समय में शरीर को भोजन की आवश्यकता नहीं होती. हालंकि ये दिन सभी हर इंसान के लिए अलग-अलग हो सकते हैं और जरूरी नहीं है कि वे बराबर अंतर पर ही आएं. अगर आप अपने जीवन में उन दिनों की पहचान करने में सफल हो जाते है जब शरीर को भोजन की मांग नहीं होती, तो आप इस सरल पद्धति से अपनी बहुत सारी शारीरिक समस्याओं को हल कर सकते है. आज हम आपको ग्यारस से जुडी कुछ ऐसी ही विशेषताएं बता रहे है.

शास्त्रों में कहा गया है कि एकादशी का उपवास 80 वर्ष की आयु होने तक करते रहना चाहिए. किंतु असमर्थ व्यक्ति को उद्यापन कर देना चाहिए जिसमें सर्वतोभद्र मण्डल पर सुवर्णादि का कलश स्थापन करके उस पर भगवान की स्वर्णमयी मूर्ति का शास्त्रोंक्त विधि से पूजन करें. घी, तिल, खीर और मेवा आदि से हवन किये जाने का प्रावधान है. जबकि दूसरे दिन द्वादशी को प्रातः स्नान कर गोदान, अन्नदान, शय्यादान, भूयसी आदि देकर और ब्राह्मण भोजन कराकर स्वयं भोजन करें. ब्राह्मण भोजन के लिए 26 द्विजदंपतियों को सात्विक पदार्थों का भोजन कर सुपूजित और वस्त्रादि से भूषित 26 कलश दें.

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