इस दिन उठ जाते है देव और शुरू हो जाती है विवाह की तारीख

देव उठनी ग्यारस के बाद से ही हिन्दू धर्म में शादी का सीज़न साल भर तक बना रहता है। देव उठनी ग्यारस के बाद ही शादी का मूहर्त निकल पाता है इसलिए हर हिन्दू परिवार के लिए यह दिन खास होता है। देवउठनी एकादशी जिसे हम देवोत्थान या फिर देव-प्रबोधिनी के नाम से भी जानते है. उत्तर भारत में दिवाली पर्व के बाद आने वाली एकादशी को हम देव-दिवाली के रूप में यह पर्व मनाते है. भारत में प्रत्येक वर्ष कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाने वाला यह त्योहार उसी वर्ष के आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष को मनाई जाने वाली तिथि देवशयन एकादशी की भांति होता है।

इस पर्व को हम तुलसी विवाह के रूप में भी मनाते है. शास्त्रों में वर्णित है की इस भव सागर में देवउठनी एकादशी का इतना अधिक महत्त्व होता है, कि इस दिन से व्यक्ति के सारे शुभकार्यों की शुरुआत हो जाती है। इस एकादशी का व्यक्ति के जीवन में अत्याधिक महत्त्व होता है. इसी दिन बहुत से मन्त्रों को सिद्ध किया जाता है. लोगो के अंदर किसी न किसी चीज की शक्ति को जगाया जा सकता है . 

धार्मिक ग्रथों के अनुसार देवशयन एकादशी के ठीक बाद के चार माह चातुर्मास कहे जाते हैं। इन्ही चार महीनों में साधु सन्यासी, संत, महात्मा किसी पवित्र नदी ,स्थान, आदि में जाकर भगवान का ध्यान उपासना करते या किसी नगर या बस्ती में ठहरकर लोगो के बीच सत्संग व धर्म का उपदेश देते है कहा जाता है की इस देवोत्थान एकादशी को यह चातुर्मास पूरा होता है. और इस दिन देवता भी जाग उठते हैं।

देवउठनी ग्यारस की महत्वता 

इस दिन तुलसी और शालिग्राम के विवाह का आयोजन भी किया जाता है। मान्यता है कि देवता जब जागते हैं. तो सबसे पहली प्रार्थना हरिवल्लभा तुलसी की ही सुनते हैं। तुलसी विवाह का सीधा अर्थ है, तुलसी के माध्यम से भगवान का आह्वान। इस दिन माँ तुलसी की बड़े विधि - विधान के साथ पूजा अर्चना की जाती है. और लोग माँ के लिए मंगलगान भी करते है. और विभिन्न  प्रकार  के  पकवान बनाकर उनका भोग लगाते है . और कथा भी कहते व सुनते है. इन सब नियमों को अपनाने से व्यक्ति के जीवन में सुख संवृद्धि आती है जीवन में उत्सुकता बढ़ती है उसे आनंद के साथ साथ परमानंद की भी प्राप्ति हो सकती है.

 

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