जैसे तीस्ता सीतलवाड़ के लिए रात को अदालत खुली, क्या हमारे लिए खुलेगी ? JNU की कुलपति का सुप्रीम कोर्ट से सवाल

जैसे तीस्ता सीतलवाड़ के लिए रात को अदालत खुली, क्या हमारे लिए खुलेगी ? JNU की कुलपति का सुप्रीम कोर्ट से सवाल
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मुंबई: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की कुलपति (VC) शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित ने रविवार, (17 सितंबर) को सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने इस बात पर सवाल उठाया कि क्या सुप्रीम कोर्ट दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करेगा, जैसा उसने तब किया था, जब उसने शनिवार रात को कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड को राहत दी थी।

बता दें कि, JNU वीसी 2002 के गोधरा कांड के बाद हुए दंगों के मामलों में निर्दोष व्यक्तियों को फंसाने के लिए सबूतों में हेराफेरी से संबंधित एक मामले में सीतलवाड को 1 जुलाई को गिरफ्तारी से सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतरिम संरक्षण दिए जाने का जिक्र कर रहीं थी। उन्होंने पुणे में 'जगला पोखरनारी डेवी वालवी' (विश्व को कमजोर करने वाले वामपंथी दीमक) नामक एक मराठी पुस्तक के विमोचन के दौरान सवाल किया कि, 'वामपंथी पारिस्थितिकी तंत्र अभी भी मौजूद है। मालूम होगा कि, तीस्ता सीतलवाड़ को जमानत देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने शनिवार रात को कोर्ट खोला था। क्या यह हमारे लिए होगा ?'

उल्लेखनीय है कि, पंडित का पुणे से पुराना नाता रहा है, क्योंकि वह महाराष्ट्र के सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान विभाग में व्याख्याता थीं। उन्होंने कहा कि, 'राजनीतिक शक्ति बनाए रखने के लिए, आपको कथात्मक शक्ति की आवश्यकता है। हमें इसे प्राप्त करने की आवश्यकता है। जब तक हम इसे हासिल नहीं कर लेते, हम एक दिशाहीन जहाज की तरह रहेंगे।' संबोधन के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि वह बचपन में RSS से जुड़े संगठनों से जुड़ी हुईं थीं। उन्होंने कहा कि, 'मैं बचपन में बाल सेविका थी। मुझे मेरे संस्कार RSS से ही मिले हैं, मुझे यह कहने में गर्व है कि मैं संघ (RSS) से हूं और मुझे यह कहने में गर्व है कि मैं हिंदू हूं। मुझे बिल्कुल भी संकोच नहीं है. गर्व से कहती हूं मैं हिंदू हूं।' जब उन्होंने यह बात कही, तो वहां मौजूद दर्शकों ने 'जय श्री राम' के नारे लगाए।

उन्होंने कहा कि, 'वामपंथ और RSS व्यक्तिगत विचारधाराएं हैं। 2014 के बाद इन दोनों विचारधाराओं के बीच संघर्ष में एक बड़ा बदलाव आया है।' बता दें कि, पंडित को पिछले साल फरवरी में JNU वीसी के रूप में नियुक्त किया गया था। उन्होंने कहा कि कुछ व्यक्तियों ने JNU परिसर में राष्ट्रीय ध्वज और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर प्रदर्शित करने की उनकी पसंद पर आपत्ति जताई थी। पंडित ने कहा कि उन्होंने उन्हें सूचित किया कि वे करदाताओं द्वारा भुगतान किए गए परिसर में मुफ्त भोजन खा रहे हैं और उन्हें राष्ट्रीय ध्वज और पीएम मोदी के चित्र के सामने झुकना चाहिए।

शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित ने कहा कि, 'जब तक मैं JNU नहीं गई, वहां पीएम मोदी, भारत के राष्ट्रपति या राष्ट्रीय ध्वज की कोई तस्वीर नहीं थी। कई लोगों ने मुझसे कहा कि मैं (उन्हें) परिसर में न लाऊं। मैंने उनसे कहा कि आप करदाताओं के पैसे से यहां मुफ्त भोजन का आनंद लेते हैं, तो उनके सामने झुकें। वह देश के प्रधानमंत्री हैं। वह किसी पार्टी के नहीं हैं। एक साल से अधिक समय बीत चुका है और किसी ने भी इसका विरोध नहीं किया है।' बिहार में बनने जा रहे नालंदा विश्वविद्यालय के संदर्भ में उन्होंने कहा कि, 'मैंने हाल ही में बख्तियारपुर में नालंदा विश्वविद्यालय का दौरा किया था। हमें बख्तियारपुर का नाम संशोधित करना चाहिए. यह एक अजीब नाम है।' उन्होंने देश की प्राचीन सभ्यता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि, 'हमारी भारतीय सभ्यता श्रेष्ठ, नारीवादी और दुनिया में सबसे महान है। द्रौपदी पहली नारीवादी हैं, कोई सिमोन डी बेवॉयर (फ्रांसीसी दार्शनिक) नहीं हैं। हमारी सभ्यता प्रकृति-केंद्रित है।'

बता दें कि, 1 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय की 3 जजों की बेंच ने विवादास्पद कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड को अंतरिम जमानत दे दी थी। इस मामले की सुनवाई जस्टिस बीआर गवई, एएस बोपन्ना और दीपांकर दत्ता की पीठ ने की थी। नियमित जमानत से इनकार करने वाले गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर न्यायमूर्ति अभय एस ओका और प्रशांत कुमार मिश्रा की दो-न्यायाधीशों की पीठ आम सहमति पर पहुंचने में विफल रही थी, जिसके कुछ ही मिनट बाद 3-न्यायाधीशों की बड़ी पीठ का गठन किया गया था। इन 3-न्यायाधीशों की पीठ का गठन भी चंद मिनटों में हुआ और सुनवाई रात 9.15 बजे निर्धारित की गई थी। CJI चंद्रचूड़, जो उस समय भरतनाट्यम प्रदर्शन देख रहे थे, कई बार उठे और तीस्ता सातलवाड की जमानत की सुनवाई के लिए एक बड़ी पीठ का गठन सुनिश्चित किया। इसी बेंच से तीस्ता सीतलवाड़ को जमानत दे दी गई। 

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