भारतीय गेहूं की गुणवत्ता में नहीं हो पा रहा सुधार

नई दिल्लीः भारत दुनिया के सबसे बड़े गेंहुं उत्पादक देशों की सूची में शुमार है। हरित क्रांति के बाद भारत में गेंहुं की पैदावार में जबरदस्त वृद्धि हुई। जिसका नतीजा निकला भारत आत्मनिर्भर देश बन गया और निर्यात भी करने लगा। लेकिन गुणवत्ता में कमी होने के कारण यह अंतराष्ट्रीय बाजार में नहीं टिक पाती। गेहूं की घरेलू प्रजातियों में प्रोटीन की मात्रा नहीं बढ़ पा रही है।इसी कारण जबरदस्त पैदावार के बावजूद घरेलू गेहूं की अंतराष्ट्रीय बाजार में निर्यात मांग की संभावनाएं नहीं बन पा रही हैं।

इसी महीने आयोजित होने वाले एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में गेहूं की गुणवत्ता, जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां और रोगों के प्रकोप को थामने जैसे विषय पर चर्चा होगी। साल 1960-70 के दशक में आई हरितक्रांति के बाद से गेहूं की साढ़े चार सौ प्रजातियां विकसित की गई है, लेकिन घरेलू गेहूं में प्रोटीन की मात्रा 12 फीसद की सीमा को नहीं छू पाई है। वैश्विक मानक के अनुरूप गुणवत्ता न होने की वजह से घरेलू गेहूं की निर्यात मांग न के बराबर है। कुछ एशियाई व अफ्रीकी देशों को छोड़कर और किसी देश में भारतीय गेहूं की मांग नहीं है।

बीएचयू के कृषि संस्थान के एग्रोनोमी क्षेत्र में जाने पहचाने वैज्ञानिक प्रोफेसर रमेश कुमार सिंह के अनुसार अगस्त के अंतिम सप्ताह में इंदौर में होने वाले 'अंतरराष्ट्रीय गेहूं व जौ अनुसंधान कार्यकर्ता सम्मेलन' इन सारी चिंताओं पर गंभीर चर्चा होगी। घरेलू गेहूं में प्रोटीन की मात्रा को बढ़ाने के साथ कई और मुद्दे होंगे, जिन पर विचार-विमर्श होगा। सम्मेलन में सीमित होते प्राकृतिक संसाधनों के बीच गेहूं की उत्पादकता को बढ़ाने और उसकी गुणवत्ता में सुधार की दिशा में किये जाने वाले कोशिशों पर चर्चा होगी। अधिकतेर प्रजातियों में प्रोटीन का मात्रा 12 प्रतिशत की गिरावट पाई गई है। इसे बढ़ाने को लेकर कोशिश जारी है।

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