केंद्र ने SC कॉलेजियम को लौटाई Gay वकील सहित 19 नामों की फाइल, कहा- पुनर्विचार करें

नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय और केंद्र सरकार के बीच तल्खी बढ़ती हुई नज़र आ रही है। केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू, पहले ही कॉलेजियम व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कह चुके हैं कि, 'जज का बेटा जज' वाली व्यवस्था सही नहीं है। दरअसल, व्यवस्था ये है कि, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम अपने मुताबिक कुछ नाम केंद्र सरकार को भेजता है और उन्ही में से सरकार को जज बनाने होते हैं। किन्तु, अब कानून मंत्रालय ने शीर्ष अदालत द्वारा नियुक्ति की सिफारिश के साथ भेजी गई फाइलों को वापस लौटा दिया है। मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से फाइलों पर पुनर्विचार करने को कहा है। बता दें कि, सर्वोच्च न्यायालय ने मंत्रालय को कुछ फाइलें भेजी थी, जो जजों की नियुक्ति से संबंधित थी। केंद्र द्वारा लौटाई गई फाइलों में वकील सौरभ कृपाल की भी फाइल है, जो अपने समलैंगिक (Gay) होने के बारे में खुलकर बयान दे चुके हैं।

नियुक्ति प्रक्रिया के जानकार सूत्रों ने बताया है कि केंद्र सरकार ने सिफारिश किए गए नामों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए बीते 25 नवंबर को फाइलें कॉलेजियम को वापस लौटा दीं। दरअसल, शीर्ष अदालत के तत्कालीन चीफ जस्टिस (CJI) एनवी रमणा के नेतृत्व वाली कॉलेजियम ने वकील सौरभ कृपाल को दिल्ली उच्च न्यायालय में जज बनाने सिफारिश की थी। सौरभ कृपाल, देश के CJI बीएन कृपाल के पुत्र हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय के कॉलेजियम की ओर से सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम को वकील सौरभ कृपाल का नाम अक्टूबर, 2017 में भेजा गया था, मगर बताया जा रहा है कि कृपाल के नाम पर विचार करने को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने तीन दफा टाला। 

अपनी समलैंगिक पहचान को खुलकर स्वीकारते हैं वकील सौरभ कृपाल:-

बता दें कि, वकील सौरभ कृपाल ने हाल ही में एक मीडिया चैनल से बात करते हुए कहा था कि उन्हें लगता है कि उनके साथ ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि वह एक समलैंगिक (Gay) हैं। एनवी रमणा से पहले CJI पद पर रहे एसए बोबड़े के कॉलेजियम ने भी कथित रूप से कृपाल का नाम टालते हुए, उनके संबंध में और भी जानकारी देने को कहा था। हालांकि बाद में एनवी रमणा के CJI बनने के बाद वकील सौरभ कृपाल को जज बना देने की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी गई थी। 

साथ ही शीर्ष अदालत ने जजों की नियुक्ति की देरी पर नाराजगी प्रकट की। अदालत ने इस देरी पर कहा कि यह नियुक्ति के तरीके को प्रभावी रूप से नाकाम करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार (28 नवंबर) को कहा कि जजों की बेंच ने जो समय-सीमा निर्धारित की थी, उसका पालन करना होगा। न्यायमूर्ति एसके कौल और न्यायमूर्ति एएस ओका की पीठ ने यह भी कहा कि, 'ऐसा लगता है कि केंद्र इस सच्चाई से नाखुश है कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम को हरी झंडी नहीं मिली। अदालत ने कहा, लेकिन यह देश के कानून के शासन को नहीं मानने का 'कारण' नहीं हो सकता है।

बता दें कि, सर्वोच्च न्यायालय ने 2015 के अपने फैसले में NJAC अधिनियम और संविधान (99वां संशोधन) अधिनियम, 2014 को निरस्त कर दिया था, जिससे शीर्ष अदालत में जजों की नियुक्ति करने वाली जजों की मौजूदा कॉलेजियम सिस्टम बहाल हो गई थी। न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि कई दफा कानून को स्वीकृति मिल जाती है और कई बार नहीं मिलती। लेकिन, यह बात यह देश के कानून के शासन को नहीं मानने की वजह नहीं हो सकती।' अदालत ने कहा कि कुछ नाम डेढ़ साल से सरकार के समक्ष विचाराधीन हैं। कभी सिफारिशों में केवल एक नाम चुना जाता है। अदालत ने कहा था कि, आप (सरकार) नियुक्ति के तरीके को प्रभावी तरीके से विफल कर रहे हैं।

कॉलेजियम व्यवस्था पर किरेन रिजिजू ने उठाए थे सवाल:-

बता दें कि, केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को एलियन (Alien) करार दिया था। केंद्रीय मंत्री ने कॉलेजियम सिस्टम का विरोध करते हुए कहा था कि सरकार तब तक कॉलिजियम सिस्टम का सम्मान करती है, जब तक किसी दूसरे सिस्टम से इसे रिप्लेस नहीं कर दिया जाता। केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने यह भी कहा था कि कॉलेजियम में खामियां हैं और यह पारदर्शी नहीं है। आरोप लगाया जाता है कि सरकार ने फाइलें रोक रखीं है, इसपर केंद्रीय मंत्री ने कहा था कि यह नहीं कहना चाहिए कि सरकार फाइलों पर बैठी हुई है। उन्होंने कहा कि 'ऐसा है तो, फाइल सरकार को भेजिए ही मत। आप खुद, अपने आप को ही नियुक्त करते हैं और आप खुद ही शो चलाते हैं, सिस्टम काम नहीं करता है। कार्यपालिका और न्यायपालिका को मिलकर काम करना होगा।'

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