B'Day : बॉलीवुड में आज भी प्रसिद्ध हैं साहिर लुधियानवी की कविताएँ

बॉलीवुड के गीतकार साहिर लुधियानवी की 98वीं जयंती है और इसी मौके पर आपको बताने जा रहे हैं उनके बारे में कुछ खास बातें. यह बॉलीवुड के एक ऐसे गीतकार और शायर रहे हैं जिनकी जगह कोई भी नहीं ले सकता. 

साहिर लुधियानवी हिन्दी फिल्मों के ऐसे गीतकार हैं जिनके गाने और गजल किसी भी पहचान के मोहताज नहीं है. 8 मार्च 1921 को पंजाब के लुधियाना शहर में साहिर का जन्म एक जमींदार परिवार में हुआ. साहिर ने अपनी 10वीं तक की पढ़ाई लुधियाना के खालसा स्कूल से पूरी की. इसके बाद वह लाहौर चले गए जहां उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई सरकारी कॉलेज से पूरी की. बाद में वह कॉलेज के कार्यक्रमों में अपनी नज्में पढ़कर सुनाने लगे जिससे उन्हें काफी शोहरत मिली. 

साहिर लुधियानवी ने 59 साल की उम्र में 1980 में दुनिया को अलविदा कहा था. लेकिन, उनके गीत आज भी सभी के जहँ में गूंजते हैं. इसके अलावा उनकी शायरी और नगमों के अलावा कई किस्से भी मशहूर हैं. मशहूर लेखिका अमृता प्रीतम और उनकी प्रेम कहानी भी इन्हीं में से एक है. जब साहिर ने उन्हें बताया कि उन्होंने ही डाकुओं के जीवन पर बनी फ़िल्म 'मुझे जीने दो' के गाने लिखे थे तो उन्होंने उन्हें सम्मानसहित जाने दिया था.

साहिर के शब्दों और गीतों ने हिंदी सिनेमा और हिंदुस्तान के लोगों पर गहरा असर छोड़ा है. आज भी 'प्यासा' फ़िल्म से उनकी यह पंक्तियां कितनी प्रासंगिक जान पड़ती है. "ये कूचे, ये नीलामघर दिलकशी के,ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के,कहां है कहां है मुहाफ़िज़ खुदी के? जिन्हें नाज़ है हिंद पर,वो कहां हैं?" ऐसे ही कई और गीत भी हैं जिनसे उन्हें जाना जाता है. इसके अलावा आपको जानकारी दे दें, 1963 में आई ताजमहल के लिए उन्हें फ़िल्मफेयर अवॉर्ड से नवाजा गया. इसके बाद 1976 में उन्होंने कभी कभी के गीत 'मैं पल दो पल का शायर हूं' के लिए भी फ़िल्म फेयर जीता.

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