जानिए शंकर से शंकराचार्य बनने की पूरी कहानी
जानिए शंकर से शंकराचार्य बनने की पूरी कहानी
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आज पीएम नरेंद्र मोदी ने रुद्रप्रयाग जिले के केदारनाथ मंदिर में आदि शंकराचार्य की प्रतिमा का अनावरण किया। 2013 की उत्तराखंड बाढ़ में नष्ट होने के बाद, आदि शंकराचार्य की समाधि का पुनर्निर्माण किया गया था। वही कई लोगों के मन में ये प्रश्न है कि आदि शंकराचार्य की कहानी क्या थी तो आइये हम बताते है आदि गुरु शंकराचार्य से जुड़ी रोचक कथा...

आदि शंकराचार्य हिन्दू धर्म के प्रसार-प्रचार तथा संरक्षण के लिए महान कार्य किया है। गुरु शंकराचार्यजी का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी को दक्षिण प्रदेश केरल के कालड़ी नामक ग्राम में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे अल्पायु थे। उन्होंने सिर्फ 32 साल की उम्र में अपना शरीर त्याग दिया था। ब्राह्राण दंपति की शादी होने के कई वर्षों के पश्चात् भी कोई संतान नहीं हुई। संतान प्राप्ति के लिए ब्राह्राण दंपति ने महादेव की उपासना की। उनकी मुश्किल तपस्या से खुश होकर महादेव ने सपने में उनको दर्शन दिए तथा वरदान मांगने को कहा। तत्पश्चात, ब्राह्राण दंपति ने महादेव से ऐसी संतान की कामना की जो दीर्घायु भी हो तथा उसकी प्रसिद्धि दूर दूर तक फैले। तब महादेव ने कहा कि या तो तुम्हारी संतान दीर्घायु हो सकती है या फिर सर्वज्ञ, जो दीर्घायु होगा वो सर्वज्ञ नहीं होगा तथा यदि सर्वज्ञ संतान चाहते हो तो वह दीर्घायु नहीं होगी। तब ब्राह्राण दंपति ने वरदान के तौर पर दीर्घायु की जगह सर्वज्ञ संतान की कामना की।

वरदान देने के पश्चात् महादेव ने ब्राह्राण दंपति के यहां संतान रूप में जन्म लिया। वरदान की वजह से ब्राह्राण दंपति ने बेटे का नाम शंकर रखा। शंकराचार्य बचपन से प्रतिभा सम्पन्न बालक थे। जब वह सिर्फ तीन वर्ष के थे तब पिता का निधन हो गया। तीन वर्ष की आयु में ही उन्हें मलयालम का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। शंकराचार्य के संन्यास ग्रहण की कहानी काफी अनोखी है। बालक शंकर का रूझान संन्यासी बनने की ओर था। उनकी माता अपने एकमात्र बेटे को संन्यासी बनने की आज्ञा नहीं दे रही थी। तब एक दिन नदी किनारे एक मगरमच्छ ने शंकराचार्य जी का पैर पकड़ लिया तब इस समय का लाभ उठाते शंकराचार्यजी ने अपने माँ से बोला माँ मुझे संन्यास लेने की आज्ञा दे दो नहीं तो यह मगरमच्छ मुझे खा जाएगा।, इससे डर कर होकर माता ने तत्काल इन्हें संन्यासी होने की आज्ञा प्रदान कर दी। भले ही आदि गुरु शंकराचार्य का जन्म दक्षिण भारत में हुआ हो मगर उनका कार्यक्षेत्र संपूर्ण भारत था। उन्होंने अद्वैत वेदांत के दर्शन का विस्तार किया। हिन्दू धर्म का संरक्षण करने के लिए आदि गुरु ने भारत के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना की। जो आज भी सनातन धर्म के सबसे पवित्र मठ माने जाते हैं तथा आस्था के बड़े केन्द्र हैं।

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