सरकार अधिकारियों को बताएं कि फ्रीडम ऑफ स्पीच के मामले से कैसे निपटें

सरकार अधिकारियों को बताएं कि फ्रीडम ऑफ स्पीच के मामले से कैसे निपटें
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चेन्नई : बीते वर्ष देश भर में अभिव्यक्ति की आजादी की बातें हर गली-मोहल्ले में छाई रही। अब इस पर मद्रास हाइ कोर्ट ने सरकार को फ्रीडम ऑफ स्पीच के मामले में सलाह दी है। कोर्ट का कहना है कि सरकार अधिकारियों को निर्देश दें कि इन मामलों में कैसे निपटना है। हाइकोर्ट ने ये बातें मशहूर तमिल लेखक और प्रोफेसर पेरुमल मुमरुगन के मामले में फैसला सुनाते हुए कही।

मुरुगन मामले में डिवीजन बेंच का नेतृत्व करते हुए मुख्य न्यायधीश संजय किशन कौल ने ये फैसला सुनाया। पेरुमल मुरुगन को उनकी किताब मधोरुबगन में लिखी कुछ टिप्पणियों के लिए ज़िला राजस्व अधिकारी की ओर से समन जारी किया गया था। उन्हें बिना शर्त माफ़ी मांगने पर भी मजबूर किया गया था।

कई दक्षिणपंथी संगठनों ने इस किताब का विरोध किया था। कोर्ट ने किताब पर प्रतिबंध लगाने की मांग को खारिज कर दिया। किताब का विरोध किए जाने के बाद मुरुगन ने फेसबुक पर ऐलान किया था कि वो लिखना छोड़ रहे है। उन्होने लिखा था कि मर गया पेरुमल मुरुगन। जिसके बाद काफी विवाद हुआ था।

उनका उपन्यास तमिलनाडु के तिरुचेंगोडे के एक गरीब निःसंतान दंपति की कहानी है। यह किताब 2011 में प्रकाशित हुई थी, लेकिन इसके विवाद के बाद इसे अंग्रेजी में 2014 में दोबारा प्रकाशित किया गया था। मामले की सुनवाई में जस्टिस कौल ने कहा कि ऐसे मामलों में शांति कायम करने के लिए क़ानूनी प्रक्रिया है और हम उसका उल्लंघन नहीं करेंगे।

कोर्ट ने कहा कि कानून व्यवस्था कायम रखना सरकार की ज़िम्मेदारी होती है लेकिन ये किसी कलाकार या लेखक को अपनी राय से हटने पर मजबूर करने की इजाज़त नहीं देती। किसी गैर सरकारी समूह को यह अधिकार नहीं है कि वो सही-गलत का फैसला करें। अभिव्यक्ति की आजादी पर बोलते हुए कोर्ट ने कहा कि यह तब तक कायम रहेगी जब तक कि कोर्ट उसे उचित प्रतिबंध के दायरे में नहीं पाता।

जब किसी प्रकाशन, कला, नाटक, फ़िल्म, गाना, कविता और कार्टून के ख़िलाफ़ कोई भी शिकायत मिलती है तो इसका ध्यान रखना चाहिए। कोर्ट ने तमिलनाड्डु सरकार को इस विवादों से निपटने के लिए विशेषज्ञों की टीम का गठन करने को कहा। इस टीम में साहित्य और कला के क्षेत्र के लोगों को शामिल करने का भी आदेश दिया गया।

सरकार कला और साहित्य को लेकर होने वाले टकराव के मामलों में अधिकारियों को संवेदनशील बनाने के लिए नियमित तौर पर कार्यक्रम चलाए।

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