बाबूलाल मरांडी की घर वापसी को लेकर राजनीतिक माहौल गरम, आवास पर चहल-पहल हुई तेज

Jan 15 2020 12:12 PM
बाबूलाल मरांडी की घर वापसी को लेकर राजनीतिक माहौल गरम, आवास पर चहल-पहल हुई तेज

भाजपा में बाबूलाल मरांडी के जाने की अटकलों की खबरों का बाजार राजनीतिक जगत में गरमा रहा है. उम्मीद की जा रही है ​कि वह भाजपा में एक बार फिर वापसी कर सकते है. उनकी भाजपा में वा​पसी की संभावनाओं को देखते हुए विपक्ष में सुगबुगाहट प्रांरभ हो गई है. बता दे कि बाबूलाल मरांडी भाजपा में जाने की खबरों के बीच झाविमो के पोड़ैयाहाट विधायक प्रदीप यादव तथा मांडर विधायक बंधु तिर्की झाविमो की कार्यसमिति के पुनर्गठन से पूर्व दलबदल कर झारखंड की राजनीति में बड़ा धमाका कर सकते हैं. पार्टी के भीतरखाने ऐसी चर्चा है. दोनों विधायकों के एक साथ झाविमो से नाता तोड़ने के बाद जहां एक ओर दलबदल का मामला स्थापित नहीं हो सकेगा, वहीं झाविमो सुप्रीमो सह गिरिडीह विधायक बाबूलाल मरांडी के भाजपा में जाने की राह आसान हो जाएगी. इसके साथ ही झाविमो के विलय को लेकर उत्पन्न ऊहापोह भी थम जाएगा. बहरहाल बाबूलाल की बुधवार की देर शाम तक विदेश से वापसी की चर्चा है और झाविमो ने 16 जनवरी तक कार्यसमिति को पुनगर्ठित करने की घोषणा कर रखी है.

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आपकी जानकारी के लिए बता दे कि बाबूलाल मरांडी के भाजपा में शामिल होने की चर्चा पर उनके पैतृक गांव कोदाईबांक के आवास में चहलपहल तेज हो गई है. मंगलवार को मरांडी की मां हरसू मुर्मू और भाई रामी मरांडी आंगन में बैठकर इसी बारे में बातचीत कर रहे थे. मां ने कहा कि बेटे के भाजपा में जाने की तैयारी की सूचना पर वे काफी खुश हैं. भाई रामी ने कहा कि भगवान राम को भी 14 वर्षों तक वनवास काटने के बाद राज मिला था और वे अयोध्या लौटे थे. उनके भाई के भी 16 वर्ष बाद भाजपा में वापस होने की खबर से उनका परिवार खुश है.

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उनकी वापसी को लेकर चर्चा है कि झाविमो के भाजपा में विलय का रोड मैप विधानसभा चुनाव 2019 से पूर्व ही तैयार हो चुका था. बाबूलाल ने इसके बाद ही महागठबंधन से किनारा कर लिया था. अलबत्ता उनका तर्क था कि झाविमो का जनाधार पूरे झारखंड में है, जबकि कांग्रेस और झामुमो का कुछ खास क्षेत्रों में. ऐसे में महागठबंधन में शामिल होने से दूसरे दलों को तो लाभ मिल जाता, झाविमो को नुकसान हो जाता. चर्चा यह भी है कि चुनाव पूर्व बाबूलाल ने सरकार बनाने की दावेदारी यूं ही नहीं की थी. भाजपा के शीर्ष नेताओं से पूर्व में ही उनकी बात हो चुकी थी. अगर भाजपा के पास संख्या बल होता तो अबतक झाविमो का भाजपा में विलय हो गया होता.

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