भारत माता की जय कहते हुए मुसलमानों के मन में भारत का नक्शा आना चाहिए

भारत माता की जय कहते हुए मुसलमानों के मन में भारत का नक्शा आना चाहिए
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नई दिल्ली : देश में असहिष्णुता के बाद अब भारत माता की जय बोलने और न बोलने पर बहस छिड़ी हुई है। इसी बीच प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य खालिद रशीद फरंगीमहली ने मंगलवार को कहा कि दारुल उलुम जैसी संस्थाओं को नाजुक मसलों पर फतवा जारी करने से बचना चाहिए। क्यों कि इससे देश और समुदाय दोनों पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

उन्होने नारे लगाने के पीछे राजनीतिक मंशा होने की बात कहते हुए कहा कि दोनों ही समुदायों की सांप्रदायिक शक्तियों ने इसे विधानसभा चुनाव को देखते हुए उछाला है। अब ऐसे में यदि कोई मौलाना फतवा जारी करता है, तो इससे सांप्रदायिक शक्तियों को इनका लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी।

हम क्यों ऐसे स्वार्थी तत्वों के हाथों की कठपुतली बनें। कोई भी मौलाना इसके लिए बाध्य नहीं है कि वो हर मुद्दे पर फतवे जारी करें। फरंगीमहली ने कहा कि पहली बात तो ये है कि संविधान के मुताबिक देश के प्रति प्रेम प्रकट करने के लिए किसी तरह का नारा लगाने या नहीं लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

उन्होंने कहा कि लेकिन मुस्लिमों ने आजादी की लडाई के दौरान इंकलाब जिन्दाबाद तथा जयहिन्द के नारे लगाये थे। यदि अनुवाद किया जाए तो भारत माता की जय का मतलब भी वही है। ऐसे में यदि हम ये नारे लगाते है, तो हमारे सामने कोई मूर्ति नहीं बल्कि भारत का नक्शा आता है।

बाबरी मस्जिद पर बोलते हुए फरंगीमहली ने कहा कि हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग मानता है कि बाबरी मस्जिद में राम लल्ला की मूर्ति है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि मुसलमानों को उस पर अपने दावे को चोड़ देना चाहिए। गौरतलब है कि एआईएमआईएम के नाता असदुद्दीन ओवैसी ने कहा था कि यदि उनकी गर्दन पर कोई चाकू भी रख दे, तो वो भारत माता की जय नहीं बोलेंगे।

इसके बाद ही दारूल उलूम देवबंद ने पिछले सप्ताह फतवा जारी कर कहा था कि मसलमानों को भारत माता की जय का नारा लगाने से बचना चाहिए क्योंकि यह इस्लाम के खिलाफ है। फतवे में कहा गया है कि ऐसा नारा तौहीद या एकरूप अल्लाह के खिलाफ है, वही अल्लाह जो इस्लाम के मूल में है। मौलाना ने तर्क दिया कि संविधान सभी नागरिकों को उनकी आस्था मानने की अनुमति देता है।

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