सिंगल मदर: बेटी के लिए रोज स्कूटी पर राजमा-चावल बेचती हैं सरिता कश्यप

दुनियाभर में कई ऐसी कहानियां हैं जो दिल को छू लेती हैं। कभी हम ऐसी कहानियां फेसबुक पर पढ़ते हैं, कभी ट्विटर पर तो कभी इंस्टाग्राम पर। हर सोशल साइट्स पर हमे ऐसी कहानियां मिल जाती हैं जो दिल को छू देती हैं और आँखों में आंसू भर देती हैं। कभी यह कहानियां किसी महिला से जुडी होती है, तो कभी यह कहानियां किसी जानवर से जुड़ी होती है तो कभी यह कहानियां किसी बच्चे या ऐसे इंसान से जुड़ी होती है जिसे देखने मात्र से आँखों से नीर की धारा बहने लगती है। आज ऐसी ही एक कहानी हम आपको बताने जा रहे हैं जो पत्थर दिल को भी पिघला देने वाली है। यह कहानी एक माँ के संघर्ष की है जिससे वह माँ योद्धा बन गईं। एक माँ अपने बच्चों के लिए सब कुछ न्यौछावर कर देती है। माँ को अपने बच्चे बहुत प्रिय होते हैं और वह अपने बच्चों के लिए क्या कुछ नहीं करती। सुबह जल्दी उठने से लेकर रात में देरी से सोने तक के बीच माँ अपने बच्चे के हर दुःख-दर्द को बाँट लेती है। एक माँ ही है जो अपने बच्चे के हर बुरे-अच्छे वक्त में उसके साथ डटकर खड़ी रहती है। ऐसी ही एक माँ हैं सरिता कश्यप।

कौन हैं सरिता कश्यप- जिस सरिता के बारे में हम बात कर रहे हैं वह एक ऑटोमोबाइल कंपनी में नौकरी करती थी। सरिता की बोलचाल बहुत अच्छी है और वह एकदम फर्राटेदार इंग्लिश भी बोल लेती हैं। अपने इसी गुण के चलते उन्हें कई कंपनियों में नौकरी मिली। कुछ समय बाद सरिता की शादी हुई और सब कुछ अच्छे से चल रहा था। समय बिता और सरिता एक बेटी की माँ बनी। बेटी को जन्म देने के कुछ सालों तक सब कुछ अच्छा रहा लेकिन अचानक शादीशुदा जिंदगी में खटास आ गई और सरिता शादी के 8 साल बाद पति से अलग हो गईं। पति से अलग होने के बाद बच्ची को सरिता ने ले लिया। वहीं जीवन से मिले अनुभवों के साथ सरिता आगे बढ़ीं। बेटी को उन्हें अकेले ही पालना था। सरिता सिंगल मदर थीं और उनके पास बेटी को पालने के लिए एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी।

सरिता कुछ ऐसा करना चाहती थी जिससे उन्हें संतुष्टि मिले, वह सिर्फ पैसा कमाने के लिए काम नहीं करना चाहती थीं उनके पास केवल एक स्कूटी थी। इसी बीच कुछ महीनों तक सरिता ने यूट्यूब देखा। यूट्यूब से सरिता को आइडिया मिला और एक दिन वह अपनी स्कूटी पर राजमा-चावल लेकर बेचने निकल गईं। सरिता यह सोचकर निकली थीं कि अगर किसी ने उनसे राजमा-चावल खरीदा तो ठीक वरना वह वापस लौट आएंगी और कुछ नया करेंगी। पहला ही दिन था और देखते ही देखते सरिता का काम बन गया। लोगों ने उनसे राजमा-चावल खरीदा और लोगों को उनके द्वारा बनाया गया राजमा-चावल बड़ा पसंद आया। सभी ने उनकी तारीफ़ की। उसके बाद सरिता समझ गईं कि उनका यह काम चल सकता है और उन्होंने ठान लिया कि अब वह यह काम करेंगी।

बेचने के लिए राजमा-चावल ही क्यों चुना- जी दरअसल यह वह डिश है जो सरिता की बेटी को खूब पसंद है। सरिता अपनी बेटी को बचपन से ही राजमा-चावल खिलाती थी। यह राजमा-चावल उनकी बेटी को बहुत पसंद था और यही कारण था कि उन्होंने राजमा-चावल ही बेचने के बारे में सोचा। सरिता राजमा-चावल का आधा प्लेट 40 रुपए में देती हैं और पूरा यानी फूल प्लेट 60 रुपए में। सरिता अपने इस काम में अब काफी आगे बढ़ चुकीं हैं। उनके ग्राहक भी काफी संख्या में हो चुके हैं जो उनके हाथ से बना राजमा-चावल खाने के लिए उनकी स्कूटी पर आते हैं। आज सरिता की स्कूटी के पास ग्राहकों की लाइन लगी रहती है क्योंकि उन ग्राहकों को कहीं और का राजमा-चावल पसंद ही नहीं है। सरिता अपनी स्कूटी पीरागढ़ी दिल्ली में सीएनजी पंप, मेट्रो स्टेशन के पास पेड़ के नीचे खड़ी करती हैं और वहीं पर उनके ग्राहक आकर उनसे राजमा-चावल लेते हैं।

गरीबों की भी हैं मसीहा- सरिता अपने पास आए किसी भी व्यक्ति को भूखा नहीं जाने देती हैं। अगर किसी के पास पैसे नहीं हैं और कोई बहुत गरीब हैं तो सरिता उन्हें बिना पैसे के खाना दे देती हैं। वह हमेशा यही सोचती हैं कि कोई भी भूखा न रहे। सरिता बड़े दिलवाली हैं और वह हर गरीब को खाना खिलाने के बाद यही कहती हैं- ''आप खाना खा लो, पैसे जब हो तब दे जाना।'' केवल इतना ही नहीं बल्कि सरिता एक ऐसी माँ हैं जो अपने बच्चों के साथ ही दूसरे बच्चों को भी भूखा नहीं दे सकती। वह उन सभी बच्चों को राजमा-चावल खिलाती हैं जो उन्हें स्टेशन या पेट्रोल पम्प के पास भीख मांगते हुए या भटकते हुए नजर आते हैं।

सरिता क्या करती हैं अपनी कमाई का- सरिता जो पैसे कमाती हैं उससे वह अपनी बच्ची की कॉलेज की फीस भरती हैं। इसी के साथ वह अपने घर का खर्च चलाती हैं। केवल इतना ही नहीं बल्कि सरिता अपने द्वारा कमाए पैसों से कुछ गरीब बच्चों को स्कूल के लिए किताब, ड्रेस, जूते भी खरीद कर देती हैं। वह अपने कमाए गए पैसों से यह दान कर खूब दुआएं भी कमाती हैं। उनके इस काम को हमारा सलाम है। सरिता यह काम साल 2019 से कर रहीं हैं और आज वह अपनी स्कूटी के पीछे एक बोर्ड लगाती हैं जिसपर लिखा है ''अपनापन राजमा-चावल'' 

सरिता की बहादुरी, उनके काम, उनकी मेहनत को देखकर मन प्रफुल्लित हो उठा। ऐसी पावन भावनाओं वाली सरिता के जज्बे ने आज दिल जीत लिया। सच में माँ तो माँ होती है। बच्चे के लिए बड़ी से बड़ी मुसीबत हो या फिर कोई अन्य काम माँ हंसकर करने के लिए तैयार हो जाती है। बच्चे पर एक भी आंच ना आए इसके लिए माँ हर मुश्किल से लड़ जाती है। वाकई में माँ का दिल बहुत बड़ा होता है और माँ के दिल जैसा दुनिया में कोई दिल नहीं होता है।

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