प्रेम दगाबाज है पानी का बुलबुला है : ओशो

Feb 14 2019 11:00 AM
प्रेम दगाबाज है पानी का बुलबुला है : ओशो

आज सभी प्यार करने वाले कपल वेलेंटाइन डे मना रहे हैं. ऐसे में आज हम प्यार की वो परिभाषा लेकर आए हैं जो ओशो ने कही थी और जिसे सुनने मात्र से प्यार का मतलब और प्यार का अहसास हो जाता है और गहरा होता जाता है. आइए जानते हैं उन्होंने क्या कहा था.

ओशो- तुम एक प्रेम में पड़ गए. तुमने एक स्त्री को चाहा, एक पुरुष को चाहा, खूब चाहा. जब भी तुम किसी को चाहते हो, तुम चाहते हो तुम्हारी चाह शाश्वत हो जाए. जिसे तुमने प्रेम किया, वह प्रेम शाश्वत हो जाए. यह नहीं हो सकता. यह वस्तुओं का स्वभाव नहीं. तुम भटकोगे, तुम रोओगे, तुम तड़पोगे. तुमने अपने विषाद के बीज बो लिए. तुमने अपनी आकांक्षा में, अपने जीवन में जहर डाल लिया. यह टिकने वाला नहीं है. यहां कुछ भी नहीं टिकता. यहां सब बह जाता है. आया और गया.

अब तुमने यह जो आकांक्षा की है कि शाश्वत हो जाए, सदा-सदा के लिए हो जाए, यह प्रेम जो हुआ, कभी न टूटे, अटूट हो, यह श्रृंखला बनी ही रहे, यह धार कभी क्षीण न हो, यह सरिता बहती ही रहे- बस, अब तुम अड़चन में पड़े. आकांक्षा शाश्वत की और प्रेम क्षणभंगुर का. अब बेचैनी होगी, अब संताप होगा. या तो प्रेम मर जाएगा या प्रेमी मरेगा. कुछ न कुछ होगा. कुछ न कुछ विघ्न पड़ेगा. कुछ न कुछ बाधा आएंगी. ऐसा ही समझो कि हवा का एक झोंका आया और तुमने कहा, सदा आता रहे.

तुम्हारी आकांक्षा से तो हवा के झोंके नहीं चलते. वसंत में फूल खिले तो तुमने कहा, सदा खिलते रहें. तुम्हारी आकांक्षा से तो फूल नहीं खिलते. आकाश में तारे थे, तुमने कहा दिन में भी रहें. तुम्हारी आकांक्षा से तो तारे नहीं चमकते. जब दिन में तारे न पाओगे, दुखी हो जाओगे. जब पतझड़ में पत्ते गिरने लगेंगे और फूलों का कहीं पता न रहेगा और वृक्ष नग्न खड़े होंगे दिगंबर, तब तुम रोओगे, तब तुम पछताओगे. तब तुम कहोगे, कुछ धोखा दिया, किसी ने धोखा दिया. किसी ने धोखा नहीं दिया है. जिस दिन तुम्हारा और तुम्हारी प्रेयसी के बीच प्रेम चुक जाएगा, उस दिन तुम यह मत सोचना कि प्रेयसी ने धोखा दिया है, यह मत सोचना कि प्रेमी दगाबाज निकला.

नहीं, न तो प्रेयसी दगाबाज है, न प्रेमी दगाबाज है- प्रेम दगाबाज है. जिसे तुमने प्रेम जाना था, वह क्षणभंगुर था. पानी का बुलबुला था. पानी के बुलबुले पर पड़ती सूरज की किरणें इंद्रधनुष का जाल बुनती थीं. कैसा रंगीन था! कैसा सतरंगा था! कैसे काव्य की स्फुरणा हो रही थी! और अभी गया. गया तो सब इंद्रधनुष गए! गया तो सब सतरंग गए. गया तो सब काव्य गया! कुछ भी न बचा. क्षणभंगुर से हम जो संबंध बना लेते हैं और शाश्वत की आकांक्षा करने लगते हैं, उससे दुख पैदा होता है.

शाश्वत जरूर कुछ है, नहीं है ऐसा नहीं. शाश्वत है. तुम्हारा होना शाश्वत है. अस्तित्व शाश्वत है. आकांक्षा कोई भी शाश्वत नहीं है. दृश्य कोई भी शाश्वत नहीं है. लेकिन दृष्टा शाश्वत है. जागो कि सोओ, सपना देखो कि जगत देखो, सब बदलता रहता है, दृष्टा नहीं बदलता. इसलिए दृष्टा शाश्वत है. बचपन में भी दृष्टा था, जवानी में भी दृष्टा था, बुढ़ापे में भी दृष्टा था. जवानी गई, बचपन गया, बुढ़ापा भी चला जाएगा, दृष्टा बचा रहता है. दृष्टा से दोस्ती बना लो. दृष्टा के साथ गठबंधन कर लो. कर्ता और भोक्ता दृश्य में उलझाव है, दृष्टा भीतर की यात्रा है. अगर मुझे कर्ता होना है तो संघर्ष होगा, कलह होगी. क्योंकि और भी कर्ता बनने निकले हैं, मैं अकेला नहीं. अगर मैं दृष्टा बनने निकलूं तो किसी से मेरा कोई संघर्ष नहीं.

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