रुकिए, कहीं आप जीवन सिर्फ काट तो नहीं रहे?

Feb 24 2021 11:35 AM
रुकिए, कहीं आप जीवन सिर्फ काट तो नहीं रहे?

असल में हजारों-लाखों लोग अवसाद के एक ऐसे दौर से गुज़र रहे है जहां उन्हें पता ही नहीं चलता कि वो अवसाद में है दिन भर सारा समय ऐसे विचारों में खोए रहना जिनका ज़िन्दगी से कोई वास्ता ही नहीं और अंत में कहीं न पहुँचना। जीवन हमारी सोच से बहुत ज्यादा बड़ा है लेकिन हम व्यर्थ ही बस जी रहे है। 

इस लॉक डाउन ने बहुत कुछ सिखाया है और बहुत कुछ सीखना बाकी है। मेरे अपने अनुभव से मैं आपसे ये साझा करना चाहता हूं। क्या आप जानते है कि अवसाद का एक बड़ा कारण हमारे हाथ में मौजूद ये फोन भी है। पहले जब फोन अस्तित्व में आया था तब फोन हमारे कंट्रोल में था लेकिन अब हमारा जीवन फोन के कंट्रोल में आ चुका है। तरह-तरह की एप्प और विज्ञापन हमारी ज़िंदगी में बहुत बुरा असर डाल रहे है। मैंने देखा है आसपास के लोगों को जो दिनभर गेम और फोन में व्यस्त रहकर चिड़चिड़े हो चुके है, उनकी सहन करने की क्षमता दिन ब दिन खत्म होती जा रही है, उनका गुस्सा उनका अहंकार उनको दीमक की तरह खोखला किए जा रहा है। 

इन दिनों अध्यात्म का महत्व समझ आया है। प्रकृति से जुड़े हुए तो पहले ही थे। प्रकृति और अध्यात्म परस्पर एक दूसरे से जुड़े हुए है। हर किसी को अपने जीवन में कुछ-कुछ मात्रा में आध्यात्मिक होना ही चाहिए। हमारे समाज में एक भ्रांति फैली हुई है कि व्यक्ति को अपनी उम्र के अंतिम वक़्त या बूढ़े होने पर ही अध्यात्म की तरफ जाना चाहिए जो बिल्कुल बेतुकी और बकवास बात है। असल में मौजूदा वक़्त में सिर्फ अध्यात्म ही एक ऐसा रास्ता है जो आपको जीवन जीना सीखा सकता है। अध्यात्म का मतलब कतई किसी धर्म से नहीं है। अध्यात्म अपने आप में एक खूबसूरत सा रास्ता है, जिसपर चलकर आप जीवन को समझते है जीवन के मूल्यों को समझते है। 

आप ही सोचिए आपने आखिरी दफ़ा सुकून से बैठे हुए ढलते हुए सूरज को कब देखा था? बारिश की बूंदों को आखिरी दफ़ा कब महसूस किया था? हम जिन साँसों के सहारे अपना जीवन जी रहे है वो महज़ सांसे नहीं है बल्कि जीवन की नदी का पानी है। पानी बिन नदी का भला क्या अस्तित्व होगा? आँख बंद करके सांसों को ध्यान से सुने हुए और महसूस करे हुए भी आपको अरसा बीत गया होगा न? मुझे लगता है हम जिस रास्ते पर चल रहे है हमें एक दफ़ा ठहरना चाहिए। ठहरकर सोचना चाहिए कि क्या यही वो रास्ता है जहां जिसपर मैं चलना चाहता हूं। 

मंज़िल जैसी कोई चीज असल में होती ही नहीं है। हमें जीवनभर रास्तों पर ही चलना होता है। जिन रास्तों पर हम चलते है उनपर चलने का निर्णय भी हमारा स्वयं का होता है, फिर अगर ज़िन्दगी से हम नाखुश होते है तो इसमें दोष कतई ज़िन्दगी का नहीं है। हम अगर ठहरकर झांककर देखे, तो पाएंगे कि सत्य असल में कुछ और है ये जो मैं जी रहा हूँ वो ज़िन्दगी नहीं कुछ और है। ज़िन्दगी तो इस सृष्टि का सबसे खूबसूरत तोहफा है।

बातों का अर्थ इतना ही है कि हम जब कह रहे होते है कि जीवन कट रहा है तो असल में ये खतरनाक ख़याल को जन्म दे रहे होते है। हमें जीवन जीने के लिए मिला। जीवन जीने और काटने में फर्क होता है। ख़ुद से जरूर सवाल कीजियेगा कहीं हम जीवन काट तो नहीं रहे?

-पीयूष भालसे

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