जन्मदिन पर जानिए दलाई लामा के जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें

तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा से जब आप मिलते हैं तो वह आपके सिर पर हाथ अवश्य ही रख देते हैं। आप महसूस करेंगे कि उनका सिर पर हाथ फेरना एकदम मां के ममत्व भरे आशीर्वाद के जैसे ही होता है। उनका ये आशीर्वाद सबके लिए समान है। इसके साथ में करुणा से भरे अद्भुत इंसान का प्यार और वो मुस्कराहट मिली है जो आपको उनके पास से हटने से रोकती है।

87वां जन्मदिन और दलाई लामा: मंगलवार, 7 जुलाई 2022 यानि आज दुनिया के इन अद्भुत आंदोलनकारी का 87वां बर्थडे है। अद्भुत इस लिहाज से कि वह तिब्बत की स्वायत्तता के लिए अपना सबकुछ न्योछावर करने के लिए तैयार हो चुके थे। तिब्बत की आजादी के लिए अपनी जन्मभूमि तक छोड़ने को दलाई लामा तैयार हैं। चीन की तिब्बत पर कब्जे की गुस्ताखी  के उपरांत इंडिया में दलाई लामा को आए हुए 63 वर्ष से अधिक हो गए हैं। यानी तिब्बत की आजादी के लिए संघर्ष करते हुए आधी सदी से अधिक खर्च हो चुकी है । संघर्ष का जो रास्ता उन्होंने 23-24 वर्ष की आयु में चुना, उससे वह आजीवन टस से मस नहीं हो पाए है। महज 23 वर्ष 9 माह की उम्र में जब उन्होंने इंडिया में प्रवेश किया तब देवभूमि हिमाचल के मैक्लोडगंज को उन्होंने अपनी कर्मभूमि बना लिया है।

महात्मा बुद्ध की छाया में दलाई लामा: महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं को तो उन्होंने अपने जीवन में उतार ही लिया था, इंडिया में आकर महात्मा गांधी के जीवन आदर्श को भी आत्मसात कर चुके है। तिब्बत पर चीन के कब्जे के विरुद्ध उन्होंने पूरी दुनिया को गोलबंद कर दिया है। साथ ही विश्व भर में फैले तिब्बतियों को एक मंच पर लाए। आत्मीयता भरी संगठन शैली से निर्वासन के बीच भी उन्होंने लोकतंत्र के मूल्यों को हर तिब्बती के दिल में उतार चुके है। इसी का नतीजा है कि निर्वासित तिब्बत सरकार का बाकायदा चुनाव किया जाता है। चुने गए प्रधानमंत्री को बड़ी सरलता से सत्ता का हस्तांतरण होता है। सबसे रोचक है कि हारे हुए प्रतिनिधि जीते नेता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्य कर रहे है।

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