बाबा साहब को कैसे मिला अंबेडकर उपनाम, जानिए इसके पीछे की पूरी कहानी

देश का संविधान बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने देश को सामाजिक समानता का मार्ग दिखाया। उन्‍होंने विज्ञान और तकनीक के माध्यम से देश के विकास का सपना देखा था। पूरा भारत सम्‍मान से उन्‍हें बाबा साहब कहता है। उनकी जिंदगी से जुड़े  अनेक किस्‍से हैं। इन्ही किस्सों में से एक किस्‍सा है उनके नाम में 'अंबेडकर' जुड़ने का। बहुत कम लोग ये जानते होंगे कि, बाबा साहेब का वास्तविक सरनेम अंबेडकर नहीं बल्कि 'सकपाल' था।  

दरअसल, बाबा साहब का जन्म महार जाति में हुआ था, जिसे उस दौर में लोग अछूत और निचली जाति मानते थे। अपनी जाति के चलते बाबा साहब को सामाजिक दुराव का भी सामना करना पड़ा। प्रतिभाशाली होने के बाद भी स्कूल में उनको छुआ-छूत के चलते अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। इसे देखते हुए उनके पिता ने स्कूल में उनका उपनाम ‘सकपाल' की जगह ‘आंबडवेकर' लिखवाया। इसके पीछे कारण यह था कि वे कोंकण के अंबाडवे गांव के मूल निवासी थे। उस क्षेत्र में गांव के नाम पर अपना उपनाम रखने का चलन था। इस प्रकार भीमराव सकपाल का नाम आंबडवेकर उपनाम से स्कूल में लिखवाया गया।

अब बाबा साहब का उपनाम आंबडवेकर हो चुका था। बाबासाहब से कृष्णा महादेव आंबेडकर नामक एक ब्राह्मण शिक्षक को काफी स्नेह था। इस स्नेह की वजह से ही उन्होंने बाबा साहब के नाम से ‘अंबाडवेकर’ हटाकर उसमें अपना उपनाम ‘आंबेडकर’ जोड़ दिया। इस तरह बाबा साहब का नाम भीमराव आंबेडकर हो गया, जिसके बाद उन्‍हें अंबेडकर कहा जाना लगा।  

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