निवेश करने के लिहाज से कितना अनुकूल समय, जानें

दुनियाभर में एक दशक पहले वर्ष 2008-09 की वैश्विक आर्थिक मंदी में एक बहुत अच्छी बात हुई. चूंकि दुनियाभर के शेयर बाजारों में तेज गिरावट आई, तो उस स्थिति में शेयर और निवेश बाजारों से जुड़ी कुछ ऐसी दिक्कतें और समस्याएं भी सामने आईं, जो सामान्य अवस्था में नहीं आ सकती थीं. कुछ दिनों पहले एक परिचित से हमारी बात हुई. वे संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई में रहते हैं. 

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अपने बयान में उन्होंने बताया कि किस तरह एक बहुराष्ट्रीय बैंक ने उनकी सारी कमाई चट कर डाली. हालांकि, यूएई एक अलग न्यायिक क्षेत्र में आता है. लेकिन जो किस्सा उन्होंने सुनाया उसमें बचतकर्ता भी भारतीय है, जिस म्यूचुअल फंड में उन्होंने निवेश किया था वह प्रोडक्ट भारतीय है और वह बैंक भारत में भी परिचालन करता है. इस लिहाज से देखें, तो यह कहानी उन सभी पाठकों के लिए बेहद लाभप्रद साबित हो सकती है जिनके रिश्तेदार विदेश में रहते हैं और भारतीय बाजार या यहां के निवेश उत्पादों में पूंजी लगाते हैं. उससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम से जो सीख मिलती है, वह भारतीय बाजारों और निवेशकों के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक हो सकती है जितनी उस बाजार में जहां की यह कहानी है.

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आपकी जानकारी के लिए बता दे कि हमारे इस परिचित या ग्राहक से कुछ समय पहले एक बैंक ने संपर्क किया. उस बैंक ने उन्हें एक भारतीय म्यूचुअल फंड उत्पाद में निवेश के लिए प्रेरित किया. बैंक के मुताबिक निवेश का तरीका कुछ ऐसा होता कि रिटर्न की मात्र बहुत बढ़ जाती. कम से कम बैंक ने तो उस वक्त यही कहा था. ग्राहक ने बैंक की कहानी पर भरोसा कर लिया और निवेश को तैयार हो गया. निवेश के लिए इसलिए भी तैयार हो गया क्योंकि वह म्यूचुअल फंड एक बेहद मशहूर भारतीय वित्तीय ब्रांड है. लेकिन ग्राहक को यह नहीं पता था कि जिस प्रोडक्ट में उसने निवेश किया है, वह एक लीवरेज्ड प्रोडक्ट है और उस प्लान में ग्राहक ने जितनी रकम का निवेश किया था, असल में निवेश उससे दोगुना था. दोगुना इसलिए था कि बैंक ने भी उतनी ही रकम का निवेश किया था. लेकिन इसमें दिलचस्प बात यह थी कि बैंक ने ग्राहक की रकम को ही गिरवी रखकर बाकी आधी रकम जुटाई थी.

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