+

पुण्यतिथि : आज़ाद थे और वे आज़ाद ही रहे

Feb 27 2016 10:52 AM
पुण्यतिथि : आज़ाद थे और वे आज़ाद ही रहे

चंद्रशेखर आज़ाद जिसके शहीद होने के कुछ देर तक अंग्रेजी पुलिस भी उसके पास तक नहीं जा सकी। ऐसा महानक्रांतिकारी जिसे अंग्रेजी हुकूमत ने कौड़े मारने की सज़ा दी और हर कौड़े पर भारत माता की जय का नारा सामने आया। क्रांतिकारी पंडित राम प्रसाद बिस्मिल्ल और सरदार भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के साथियों में से वे एक थे। वर्ष 1922 में गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन को बंद कर दिए जाने के चलते चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने विचारों को बदला। अब वे क्रांतिकारी विचारों के हो गए। अंग्रेजी ताकत को हिलाने के लिए क्रूर अंग्रेजी अफसरों की हत्या करना, ब्रिटिश खजाने को लूटना और अन्य बातें ऐसी थीं जो बहुत अलग थीं। मगर अंग्रेजी रियासत की जड़ें उखाड़ने के लिए यह बेहद जरूरी था।

क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ने के साथ अब चंद्रशेखर आज़ाद ने हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य के तौर पर क्रांति की शुरूआत की। यूं तो आज़ाद में 23 जुलाई 1906 को भाभरा में जन्म के बाद के करीब 10 - 12 वर्षों बाद ही अंग्रेजी रियासतों को लेकर विरोध उफन गया था लेकिन जब वे बड़े हुए तो महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़े गए बाद में उन्होंने क्रांति की नई शुरूआत की। आज़ाद अपने साथियों के साथ किसी भारतीय पुलिस सिपाही या अधिकारी को नहीं मारते थे वे उन्हें हवाई फायर कर बचने का अवसर भी देते थे।

उनका मानना था कि उनकी लड़ाई केवल अंग्रेजों के साथ थी। राम प्रसाद बिस्मिल्ल के साथ उन्होंने 9 अगस्त 1925 को काकोरी कांड किया जिसके बाद वे फरार हो गए। इसके बाद 1927 में बिस्मिल्ल के साथ 4 प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की क्रांतिकारी पार्टियों को मिलाकर एक किया। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन कर क्रांतिकारियों का अलग दल बनाया।

उनके क्रांतिकारी दल से भगत सिंह भी जुड़े। भगत सिंह ने आज़ाद का बहुत सम्मान किया। 1919 में अमृतसर के जलियावाला बाब नरसंहार ने देश के नवयुवकों को उद्वेलित कर दिया। अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद उस दौरान अध्ययन कर रहे थे। महात्मा गांधी ने वर्ष 1921 में असहयोग आंदोलन का फरमान जारी कर दिया। तो फिर चंद्रशेखर आज़ाद भी इस आंदोलन में कूद पड़े। फरवरी 1922 में चैरी चोरा में पुलिस थाने को भीड़ द्वारा फूंक दिए जाने के बाद महात्मा गांधी ने अपना आंदोलन वापस ले लिया।

इसके बाद आज़ाद की उम्मीदें टूट गईं। उन्होंने क्रांतिकारियों का एक दल बनाया और सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई। 9 अगस्त 1925 को काकोरी कांड किया गया और ट्रेन में आ रहा खजाना लूट लिया गया। काकोरी कांड में अशफाक उल्लखान और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सज़ा दी गई लेकिन आज़ाद हाथ नहीं आए थे। उनका कहना था कि वे आज़ाद ही थे और आज़ाद ही रहेंगे। बाद में 27 फरवरी 1931 के दिन घटित घटना में आजाद को गद्दारों द्वारा अंग्रेजों को दी गई सूचना का सामना करना पड़ा।

पुलिस इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में पहुंची। आज़ाद और पुलिस के बीच गोलीबारी हुई काफी देर तक हुई गोलीबारी के दौरान भी अंग्रेज उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाए। इसके बाद आज़ाद ने अपनी ही रिवाॅल्वर की गोली से स्वयं को मार दिया। वृक्ष के नीचे आज़ाद वीरगति को प्राप्त हुए लेकिन अंग्रेज देर तक उनके पार्थिव शरीर के पास तक नहीं पहुंचे।