बसपा—सपा का साथ कांग्रेस के लिए परेशानी

Oct 06 2018 06:22 PM
बसपा—सपा का साथ कांग्रेस के लिए परेशानी

क्या कभी ऐसा हो सकता है कि दो धुर विरोधी एक साथ आ जाएं? क्या कभी दो दुश्मन गले मिल सकते हैं? क्या कभी आपने ऐसा देखा है कि एक—दूसरे पर आरोप लगाने वाले एक—दूसरे से हाथ मिला लें ? नहीं न, लेकिन राजनीति में यह सब संभव है। कहा जाता है कि राजनीति ऐसा क्षेत्र हैं, जहां पर सब अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहते हैं और फिर इसके लिए भले ही उन्हें गधे को भी काका क्यों न बनाना पड़े? 

ऐसा ही कुछ इस समय देखने को मिल रहा है। बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी राजनीतिक क्षेत्र में एक—दूसरे की विरोधी रही हैं। यह दोनों ही पार्टियां उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक—दूसरे  पर आरोप—प्रत्यारोप लगाती रही हैं, लेकिन 2019  का रण जीतने के लिए  इन्होंने एक—दूसरे से हाथ मिलाने जा रही हैं। इसकी शुरुआत इन्होंने इसी साल नवंबर में होने वाले मध्यप्रदेश चुनावों से कर सकती हैं। मध्यप्रदेश में 28 नवंबर को चुनाव होने हैं और बसपा—सपा मिलकर इस  समर को पार करने की तैयारी में हैं। 

अभी हाल ही में  मध्यप्रदेश में सीटों के बंटवारे को लेकर बसपा ने कांग्रेस से किनारा कर लिया था। इसके बाद कांग्रेस ने सपा से  बात की थी, लेकिन लगता है कि वहां भी बात नहीं बनी और साइकिल ने हाथी को साथ लेने का फैसला कर लिया। अगर मायावती और अखिलेश साथ आते हैं, तो यह कांग्रेस के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। दरअसल, कांग्रेस जिस महागठबंधन के सहारे 2019 का रण जीतने का ख्वाब पाल रही थी, वह टूटता दिखाई दे रहा है।  हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अभी भी उम्मीद है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा फिर उनके साथ आएगी, लेकिन अभी जो स्थितियां बनती दिखाई दे रही हैं, उससे तो यही लगता है कि राहुल शेखचिल्ली के सपने देख रहे हैं,  जो  कभी पूरे नहीं  हो सकते। 

दरअसल, वोट बैंक की राजनीति के  तहत सपा और बसपा साथ आने की कोशिशें तो कर रहे हैं, लेकिन इन दोनों पार्टियों का जो एक—दूसरे के साथ इतिहास रहा है, उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि इनका यह गठबंधन ज्यादा देर  तक नहीं चलेगा। भले ही मायावती और अखिलेश यादव खुद को  एक साथ बता रहे हों, लेकिन पार्टी के सिद्धांत अलग—अलग हैं और इन दोनों की नेताओं की महात्वाकांक्षा बहुत ज्यादा है। दोनों ही नेता खुद को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं, ऐसे में उनका एक—दूसरे के साथ लंबा चल पाना मुश्किल लगता है। फिलहाल तो यह देखना दिलचस्प होगा कि किस तरह से दोनों पार्टियां मध्यप्रदेश में अपनी सफलता के लिए रणनीति बनाती हैं और कैसे मध्यप्रदेश की जनता का रुख  अपने पक्ष में करती हैं। खैर इनका यह मिलन जनता को कितना रास आता है, यह तो 11 दिसंबर को मतगणना के बाद पता चल ही जाएगा, फिलहाल इनके मिलन से कांग्रेस को सतर्क होने की जरूरत है और अगर उसे 2019 में अपनी नैया पार लगानी है, तो चुनावी समर में उतरने से पहले महागठबंधन के साथियों के साथ गठबंधन की कोशिशें करनी होगी। 

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