माता वैष्णो का ऐसा भक्त जिसकी कहानी सुनकर रो पड़ेंगे आप

आज तक आप सभी ने कई पौराणिक कथाओं के माध्‍यम से देवी-देवताओं से जुड़ी चमत्‍कारिक और रोचक कहानियां सुनी और पढ़ी होंगी। वैसे अक्‍सर पौराणिक कथाओं में ईश्‍वर की महिमा के बारे में बताया जाता है और बताया जाता है कि कैसे हर युग में बुराइयों और अत्‍याचारियों का अंत करने के लिए भगवान ने हर बार अवतार लिया और धरती से पाप के बोझ को कम किया। हालाँकि आज हम आपको देवी देवताओं की नहीं बल्कि ऐसे भक्‍त की कहानी के बारे में बताने जा रहे हैं जिसकी भक्ति को दुनिया ने नमन किया है। यह कहानी है बाबा जित्‍तो की। जी दरअसल यह कहानी है जम्‍मू-कश्‍मीर इलाके। कहा जाता है यहां गरीब ब्राह्मण परिवार में एक बच्‍चे का जन्‍म हुआ था।

बच्‍चे का नाम जेतमल रखा गया। स्‍वभाव से चंचल इस बच्‍चे का बचपन से मन धार्मिक कार्यों में लगने लगा था। यही वजह थी कि गांव वाले उसे मुनि कहने लगे थे। बड़े होकर जेतमल का विवाह माया देवी से हुआ था। पत्‍नी के साथ मिलकर जेतमल अपने बुजुर्ग माता-पिता की खूब मन लगाकर सेवा करता था। अचानक एक दिन उसके माता-पिता का देहांत हो गया और इस वजह से जेतमल परेशान रहने लगा। फिर किसी के के कहने पर उसने माता वैष्‍णो देवी की भक्ति और आराधना आरंभ कर दी। एक‍ बार रात की नींद में उसे सपना आया कि उसके यहां पुत्री का जन्‍म होगा और यह कन्‍या बेहद चमत्कारिक होगी। संसार भर में उसकी पूजा होगी। उसी के कुछ सालों बाद उसके घर में एक कन्‍या का जन्‍म हुआ। मां दुर्गा की भक्ति से प्रभावित जेतामल ने उस कन्‍या का नाम गौरी रखा। एक बार बड़े होने पर गौरी को कोई असाध्‍य रोग हो गया तो किसी ने जेता को गांव छोड़कर जाने की सलाह दी। जेता अपनी बेटी और अपने पालतू कुत्‍ते के साथ गांव छोड़कर चला गया।

वह जम्‍मू तहसील के कानाचक्‍क गांव के पिंजौड़ क्षेत्र में आकर रहने लगा। पिंजौड़ को अब झिड़ी कहा जाने लगा है और यहां पर हर साल मेला लगता है। वहीं पिंजौड़ में आकर जैतमल ने एक जगह तलाश करके वहां पर खेती करने का विचार बनाया तो पता चला कि वह जमीन किसी बड़े जागीरदार की है। उस जागीरदार ने जैतमल के सामने यह शर्त रखी कि वह उसको जमीन पर खेती करने की इलाजत तभी दे सकता है जब वह उसे फसल का एक चौथाई हिस्‍सा देगा। जैतमल इस शर्त को मानकर खेती करने लगा और कड़ी मेहतन करने पर इस बंजर जमीन पर भी अनाज की फसल लहलहाने लगी। यह देखकर जागीरदार को लालच आ गया। वह जैतमल से आधा हिस्‍सा मांगने लगा। जैतमल अपनी फसल देने को तैयार नहीं हुआ तो जागीरदार ने अपने आदमियों को भेजकर उसकी पूरी फसल उठाने का आदेश दिया।

ऐसा माना जाता है कि खुद पर विपत्ति आने पर जैतमल ने मां भगवती की सच्‍चे मन से स्‍मरण किया जो उसकी अंर्तआत्‍मा से यह आवाज आई कि वह अन्‍याय का अंत करने के लिए अपनी जान कुर्बान कर दे। उसके बाद जैतमल ने तलवार से काटकर खुद का अंत कर दिया और पूरा अनाज जैमतल के खून से लाल हो गया। तब जैतमल की बेटी ने अपने पिता का अंतिम संस्‍कार किया और खुद भी उसी अग्नि में जलकर भस्‍म हो गई। तब से जैतमल जित्‍तो बाबा कहलाने लगे और जागीरदार का पूरा परिवार बीमार रहने लगा और इस तरह उसके पूरे वंश का अंत हो गया। इस प्रकार अन्‍याय पर न्‍याय की जीत हुई और बुराई का अंत गया। कहा जाता है उसके बाद इस इलाके के राजा अजबदेव सिंह ने इसी स्‍थान पर जित्‍तो बाबा की समाधि और मंदिर दोनों बनवाए। उसी के बाद से यहां पर हर साल जित्‍तो बाबा को याद करते हुए झिड़ी की मेला लगता है और श्रृद्धालु यहां बाहर मनौतियां मांगते हैं।

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