क्या आपका माफीनामा, विज्ञापनों जितना बड़ा था ? एलोपैथी बनाम आयुर्वेद मामले में SC ने बाबा रामदेव को फिर फटकारा

क्या आपका माफीनामा, विज्ञापनों जितना बड़ा था ? एलोपैथी बनाम आयुर्वेद मामले में SC ने बाबा रामदेव को फिर फटकारा
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आज मंगलवार (23 अप्रैल) को पतंजलि आयुर्वेद से पूछा कि क्या उनके द्वारा कल अखबारों में प्रकाशित सार्वजनिक माफी उनके विज्ञापनों जितनी बड़ी थी। न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट को दिए गए एक वचन के उल्लंघन में भ्रामक चिकित्सा विज्ञापन प्रकाशित करने के लिए पतंजलि आयुर्वेद, इसके प्रबंध निदेशक आचार्य बालकृष्ण और सह-संस्थापक बाबा रामदेव के खिलाफ अवमानना मामले पर विचार कर रही थी।

कल सोमवार को, पतंजलि आयुर्वेद ने कुछ अखबारों में विज्ञापन प्रकाशित कर "हमारे अधिवक्ताओं द्वारा शीर्ष अदालत में बयान देने के बाद भी विज्ञापन प्रकाशित करने और प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करने की गलती" के लिए सार्वजनिक तौर पर माफी मांग ली थी। पतंजलि के वकील वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने पीठ को विज्ञापनों के बारे में जानकारी दी। इस दौरान बाबा रामदेव और बालकृष्ण दोनों व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित थे। इस पर न्यायमूर्ति कोहली ने पूछा, "क्या माफ़ी का आकार आपके विज्ञापनों के समान है?" रोहतगी ने जवाब दिया, "इसकी कीमत लाखों में है।" बाबा रामदेव के वकील ने कोर्ट को बताया कि माफी 67 अखबारों में प्रकाशित हुई थी। जिस पर न्यायमूर्ति कोहली ने पूछा, "क्या आपके द्वारा प्रकाशित पूर्ण-पृष्ठ विज्ञापनों के लिए भी वही लाखों रुपये खर्च होते हैं? हम हैरान हैं।"

पीठ ने सुनवाई 30 अप्रैल तक के लिए स्थगित करते हुए पतंजलि के वकीलों से माफीनामे वाले विज्ञापनों की प्रति कोर्ट में लाने को कहा। पीठ ने माफीनामा का विज्ञापन पेश नहीं करने पर पतंजलि के वकीलों को फटकार लगाई। जस्टिस कोहली ने कहा कि "वास्तविक अखबार की कतरनें काट लें और उन्हें अपने पास रखें। आप उन्हें बड़ा करके फोटोकॉपी करेंगे, तो हो सकता है कि हम प्रभावित न हों। हम विज्ञापन का वास्तविक आकार देखना चाहते हैं। जब आप माफी मांगते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि हमें उसे एक माइक्रोस्कोप द्वारा देखना होगा।" 

कोर्ट ने FMCG कंपनियों द्वारा किए गए भ्रामक स्वास्थ्य दावों के बड़े मुद्दे का पता लगाने का भी इरादा व्यक्त किया और उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय और सूचना और प्रसारण मंत्रालय को मामले में पक्षकार बनाया। अदालत ने आयुष मंत्रालय द्वारा जारी उस पत्र के संबंध में भी केंद्र सरकार से स्पष्टीकरण मांगा, जिसमें राज्यों से औषधि एवं प्रसाधन सामग्री नियम, 1945 के नियम 170 के अनुसार आयुष उत्पादों के विज्ञापन के खिलाफ कार्रवाई करने से परहेज करने को कहा गया था।

सुप्रीम ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) को भी "अपना घर व्यवस्थित करने" की जरूरत है क्योंकि डॉक्टरों (IMA सदस्य) द्वारा अनैतिक आचरण की कई शिकायतें हैं। इस संबंध में पीठ ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन को मामले में एक पक्ष के रूप में जोड़ने का निर्देश दिया। इससे पहले, कोर्ट ने पतंजलि और रामदेव द्वारा दायर माफी के हलफनामे को यह कहते हुए स्वीकार करने से इनकार कर दिया था कि वे अयोग्य थे या बिना शर्त के नहीं थे। पिछली तारीख पर, रामदेव और बालकृष्ण दोनों ने सुप्रीम कोर्ट से व्यक्तिगत रूप से माफी मांगी थी, लेकिन अदालत ने उसे नहीं माना था।

10 अप्रैल की सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम 1954 के तहत पतंजलि के खिलाफ कार्रवाई करने में विफल रहने के लिए उत्तराखंड राज्य के अधिकारियों को भी फटकार लगाई थी। कोर्ट ने केंद्र सरकार को भी कोविड के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने के लिए फटकार लगाई। महामारी के दौरान पतंजलि द्वारा अपने "कोरोनिल" उत्पाद से इलाज का दावा किया गया था।

बाबा रामदेव विज्ञापन मामला क्या है :-

दरअसल, बाबा रामदेव ने अपनी कुछ दवाओं का विज्ञापन करते हुए ये कह दिया था कि, ये भ्रान्ति है कि शुगर और BP जैसी बीमारियों का स्थायी इलाज नहीं है, (उनकी) आयुर्वेदिक दवाओं से ये पूरी तरह ठीक हो सकता है। अब मॉर्डन मेडिकल साइंस का ये दावा है कि डायबिटीज़ (शुगर) एक आजीवन रहने वाली बीमारी है और इसे जीवन भर दवा खाकर कंट्रोल किया जा सकता है, बढ़ने पर इन्सुलिन लिया जा सकता है, लेकिन पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता। आधुनिक मेडिकल साइंस का मानना है कि शुगर के मरीज को आजीवन दवाएं या इन्सुलिन लेनी ही होती है। हाँ, शुरूआती चरण में इसे खान-पान पर नियंत्रण रखकर कंट्रोल किया जा सकता है। अब इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) बाबा रामदेव के इसी दावे के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा कि उन्होंने अपनी आयुर्वेदिक दवा बेचने के लिए झूठा दावा किया। सुप्रीम कोर्ट ने रामदेव को फटकार लगाई कि वो एलॉपथी के खिलाफ नहीं बोल सकते और ऐसे भ्रामक विज्ञापन नहीं कर सकते। बाबा रामदेव ने सुप्रीम कोर्ट में माफ़ी मांग ली, जिसे कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया और सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगने को कहा। जिसके बाद पतंजलि आयुर्वेद ने 67 अख़बारों में लिखित माफ़ी छपवाई, अब कोर्ट ने उन अख़बारों की कतरन मांगी है। हालाँकि, गौर करने वाली एक बात ये भी है कि, हर एलॉपथी दवाई का साइड इफ़ेक्ट होता ही है, आप किसी भी गोली का नाम लिखकर इंटरनेट पर सर्च करेंगे, तो इसकी जानकारी मिल जाएगी। अब जीवन भर चलने वाली गोलियों का मरीज के शरीर पर कितना और क्या साइड इफ़ेक्ट  होगा ? क्या IMA ने ये कभी बताया है ? 

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