मूवी रिव्यु : इरफान के संवाद का दिखा जादू

मर्डर केस पर आधारित फिल्मे तो पहले भी बन चुकी है, लेकिन 'तलवार' फिल्म विशाल और मेघना गुलजार ने मर्डर केस को सुलझाने के लिये नहीं बनाई है। जब इस फिल्म का एक पहलू देखते है तो वह सही लगता है लेकिन जैसे ही दूसरा पहलू सामने आता है तो लगता है वह सही है। फिल्म की कहानी तो एक दम सही है लेकिन फिल्म के निर्माता और निर्देशक ने इसे अपने हिसाब से बनाया है। निर्देशक ने फिल्म के सभी पात्रो को असली कहानी के आस पास ही बताया है। फिल्म के कलाकारो को अच्छा लूक और फिल दिया गया है। अगर इस फिल्म को मेघना की जगह विशाल निर्देशित करते तो फिल्म का रंग और उभर कर आता। 

फिल्म मे आरुषि का नाम श्रुति रखा गया है। फिल्म मे परिवार का नाम भी बदल दिया गया है। तलवार की जगह परिवार का नाम टंडन रहता है। आरुषि और परिवार का नाम बदलने के बाद भी पता चलता है कि यह फिल्म आरुषि हत्याकांड पर बनाई गई है। इस फिल्म को लेकर अपनी भावनाओ को टूटते हुए देख सकते है। फिल्म के लेखक और निर्माता ने अच्छी होशियारी दिखाने की कोशिश की है। 

इस फिल्म मे अच्छे कलाकारो को लिया गया है। फिल्म मे कोंकणा सेन शर्मा और नीरज काबी श्रुति के माता पिता के रूप मे अच्छे लगते है। कोंकणा और नीरज ने श्रुति के माता पिता का किरदार अच्छे से किया है। इस फिल्म मे उनका एक ऐसा संवाद है जो आपको अच्छा ना लगे। उन्होने कहा है कि चलो अब रोना धोना भी है। इनका यह संवाद फिल्म की कड़ी को कमजोर कर देता है।  इस फिल्म मे इरफान खान भी है। उनकी एक्टिंग देखने लायक है। इरफान के कुछ संवाद इतने अच्छे है जो आपको यह सोचने पर मजबूर कर देंगे कि इरफान के संवाद एक जादू की तरह है। 

 

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