होयसल साम्राज्य का बेशकीमती उपहार, इस मंदिर के निर्माण में तीन पीढ़ियों को लगे थे 103 वर्ष

नई दिल्ली: इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत पूरे विश्व में अपनी एक अलग पहचान और आकर्षण रखता है। यहाँ की संस्कृति से लेकर कलाकृतियों को देखने के लिए पूरे साल भारी तादाद में देशवासियों सहित विदेशी पर्यटक भी आते हैं। इसी क्रम में कर्नाटक के सोमनाथपुरा में कावेरी नदी के तट पर मौजूद चेन्नाकेसवा मंदिर और केशव मंदिर मैसूर शहर से 38 किलोमीटर पूर्व में स्थित है।

लगभग 9 शताब्दी पहले दक्षिण भारत में होयसल साम्राज्य अपने चरम पर था। भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण विभाग (ASI) के अधीन केशव मंदिर होयसल स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है। यह मंदिर भगवान विष्णु के चेन्नाकेशव रूप को समर्पित है। इसका अर्थ है सुंदर (चेन्ना) और विष्णु (केशव)। स्थापत्य और मूर्तिकला के लिहाज से भारत के सर्वोत्तम मंदिरों में से एक इस मंदिर को कई दफा लूटा गया, किन्तु तत्कालीन शासकों ने बार-बार इसका जीर्णोद्वार करवाया। हाल ही में देश के अपने माइक्रो-ब्लॉगिंग मंच Koo एप पर सीक्रेट टेम्पल्स ने अपने आधिकारिक हैंडल के माध्यम से इस मंदिर का खूबसूरत इतिहास को दुनिया के सामने रखा है।

 

Koo App
चेन्नाकेश्व मंदिर, सोमनाथपुरा, कर्नाटक, भारत। मंदिर को 1258 सीई में होयसल राजा नरसिंह III के एक सेनापति सोमनाथ दंडनायक द्वारा संरक्षित किया गया था। केशव मंदिर, होयसला साम्राज्य के राजाओं द्वारा अपने राज्य के विभिन्न हिस्सों में निर्मित लगभग 1,500 हिंदू और जैन मंदिरों में से एक है। अन्य अच्छी तरह से अध्ययन किए गए होयसल मंदिरों में बेलूर और हलेबिडु शामिल हैं। . . चित्र क्रेडिट - @pix_teller ???? . अधिक जानकारी के लिए फॉलो करें - @secret_temples। - Secret Temples (@secret_temples) 17 May 2022

विष्णुवर्धन ने कराया मंदिर का निर्माण

बता दें कि बेलूर के चेन्नाकेशव मंदिर का निर्माण राजा विष्णुवर्धन ने 1117 ई. में करवाया था। वास्तुकला की इस उत्कृष्ट कलाकृति के निर्माण में राजवंश की तीन पीढ़ियों को 103 वर्ष लग गए। ऐसा कहा जाता है कि इसके निर्माण में 1000 से भी ज्यादाकारीगरों का योगदान था।

अद्भुत है बनावट

पूरा मंदिर बाकी होयसल मंदिरों की तरह एक ऊँचे चबूतरे पर स्थित है। परिसर में तीन मंदिर स्थित हैं, जो बेहतरीन नक्काशी के साथ बनाए गए हैं। इन तीनों मंदिरों में केशव, जनार्दन और वेणुगोपाला भगवान की प्रतिमाएं थीं, मगर भगवान केशव मूर्ति को आक्रमणकारियों ने गायब कर दिया, जिसके बाद अब यहाँ दो ही प्रतिमाएं रह गई हैं।

बेलूर का होयसल राजवंश

होयसल राजवंशी मूलतः पश्चिमी घाट के मलनाडू नामक क्षेत्र के थे। इन्हें युद्ध कौशल में खास तौर पर निपुण माना जाता था। इन्होंने चालुक्य और कलचुरी वंशों के बीच चल रहे आंतरिक युद्ध का फायदा उठाते हुए कर्नाटक के कई क्षेत्रों पर आधिपत्य स्थापित किया था। 13वीं सदी तक उन्होंने कर्नाटक के ज्यादातर क्षेत्रों, तमिलनाडु के कुछ क्षेत्रों तथा आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के कई क्षेत्रों तक साम्राज्य स्थापित कर लिया था।

होयसल वास्तुकला

होयसल काल को इस क्षेत्र का स्वर्णिम काल माना जाता है। दक्षिण भारत में कला, वास्तुशिल्प, साहित्य, धर्म तथा विकास के क्षेत्र में होयसल राजवश का बेहद अहम योगदान रहा है। शुरुआत में बेलूर नगरी उनकी राजधानी थी। कालांतर में उन्होंने हैलेबिडु में स्थानांतरण किया, जिसे द्वारसमुद्र भी कहते हैं। आज होयसल राजवंश को विशेष रूप से उत्कृष्ट होयसल वास्तुकला के लिए याद किया जाता है।

होयसल वास्तुकला से सुशोभित 92 मंदिर

वर्तमान में होयसल वास्तुकला से सुशोभित तक़रीबन 92 मंदिर स्थित हैं, जिनमें 35 मंदिर हासन जिले में स्थित हैं। इनमें नग्गेहल्ली का लक्ष्मी नरसिंह मंदिर, बेलवाड़ी में वीर नारायण मंदिर, अरसिकेरे में ईश्वर मंदिर, कोरवंगला का बूचेश्वर मंदिर, हैलेबिडु में जैन बसदी, किक्केरी में ब्रहमेश्वर मंदिर अन्य कई मंदिरों में से हैं जो होयसल वास्तुशिल्प के लिए मशहूर हैं।

12वीं सदी का होयसल मंदिर अब UNESCO वर्ल्ड हेरिटेज की रेस में

कर्नाटक के बेलूर, हलेबिड और सोमनाथपुरा के होयसल मंदिरों को वर्ष 2022-2023 के लिए विश्व विरासत सूची के लिए भारत के नामांकन के रूप में शामिल किया गया है। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने सोमवार को इस संबंध में जानकारी दी थी। होयसल के पवित्र स्मारक 15 अप्रैल 2014 से UNESCO की संभावित सूची में हैं और देश की समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत की गवाही देते हैं।

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