नूपुर शर्मा को दोषी बताने वाले जजों को जस्टिस ढींगरा ने सिखाया कानून, पढ़ें एक·एक बयान

नई दिल्ली: एक बयान के चलते हत्या ! सुप्रीम कोर्ट के ये शब्द सुनकर पूरे भारत में खलबली मची हुई है। लोगों ने आजतक मीडिया रिपोर्ट में यह सुना था कि मामूली कहासुनी में किसी का कत्ल कर दिया गया, पर लोकतान्त्रिक देश की अदालत के मुंह से ये शब्द पहली बार सुने थे कि हत्या का कारण एक बयान ही है। लेकिन यहां मामला पूरी तरह से धर्म से जुड़ा हुआ था और  दुनिया के दो बड़े धर्मों को लेकर अभद्र टिप्पणी की गई थी। एक तरफ से शिवलिंग को प्राइवेट पार्ट बोला गया, तो वहीं सामने से पैगंबर पर टिप्पणी कर दी गई। अब शुरुआत किस तरफ से हुई ये देखना कोर्ट का काम है। लेकिन, क्या कोर्ट किसी को ये बोलकर पल्ला झाड़ सकता कि आपकी 'हत्या' का दोषी आपका एक विवादित बयान है ? ये सवाल उठना शुरू हुआ सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला द्वारा भाजपा की निलंबित प्रवक्ता नुपुर शर्मा पर की गई त्वरित टिप्पणी से। जिन्होंने उदयपुर में दुकान में घुसकर की गई कन्हैयालाल की नृशंस हत्या का जिम्मेदार नुपुर शर्मा को बताया। मानो कोर्ट यह कहना चाह रहा हो कि, चूंकि कन्हैयालाल के मोबाइल से नुपुर शर्मा का समर्थन वाला पोस्ट किया गया था, जिससे कुछ लोगों की भावनाएं आहत हो गई और कन्हैया को अपनी जान गंवाकर इसकी कीमत चुकानी पड़ी, अतः उनकी हत्या के लिए नुपुर ही जिम्मेदार है, क्योंकि वो उनका ही समर्थक था। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट की त्वरित टिप्पणी की हर तरफ आलोचना हो रही है। अब जस्टिस कांत और जस्टिस परदीवाला की टिप्पणी पर दिल्ली हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज एस एन ढींगरा की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है।

नुपुर शर्मा पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी गैर जिम्मेदार और गैरकानूनी :–

रिटायर्ड जज एसएन ढींगरा ने भी मीडिया में उदयपुर हिंसा के लिए नुपूर शर्मा को जिम्मेदार बताए जाने पर कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जजों की यह टिप्पणी उनके ख्याल से बहुत गैर जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि, उनका (सुप्रीम कोर्ट के जजों का) कोई अधिकार नहीं है कि वो इस तरह की टिप्पणी करें, जिससे जो व्यक्ति आपके पास इंसाफ माँगने आया है, उसका पूरा करियर चौपट हो जाए या जो निचली अदालते हैं, वो पक्षपाती हो जाएँ। जस्टिस ढींगरा ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने नुपूर को सुना तक नहीं और आरोप लगाकर अपना फैसला सुना दिया। मामले में न सुनवाई हुई, न कोई गवाही, न कोई जाँच हुई और न नुपूर को अपनी सफाई पेश करने का कोई मौका दिया गया। तो इस तरह सुप्रीम कोर्ट का टिप्पणी करना न सिर्फ गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि गैर कानूनी भी है और अनुचित भी। सुप्रीम कोर्ट को ऐसी टिप्पणी को करने का कोई अधिकार नहीं है।

ऐसी टिप्पणियां करना हैं तो राजनेता बन जाएं, जज क्यों हैं ·

जस्टिस एसएन ढींगरा ने पुछा कि आखिर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने नूपुर शर्मा को लेकर कही गई अपनी बातों को लिखित आदेश में क्यों नहीं शामिल किया ? उन्होंने कहा कि यदि जजों को ऐसे ही टिप्पणी करनी है तो, उन्हें राजनेता बन जाना चाहिए वो लोग जज क्यों है ?

सुप्रीम कोर्ट भी कानून से ऊपर नही:–

जब जस्टिस ढींगरा से सवाल किया गया कि आखिर कैसे कोर्ट की टिप्पणी गैर कानूनी हो सकती है तो उन्होंने अपने जवाब में कहा कि, अदालत, कानून से ऊपर नहीं है। कानून कहता है कि यदि आप किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना चाहते हैं, तो पहले आपको उसके ऊपर आरोप तय करना होगा और इसके बाद जाँचकर्ता सबूत पेश करेंगे, फिर बयान लिए जाएँगे, गवाही होगी तब जाकर सभी सबूतों को मद्देनजर रखकर अपना फैसला सुनाया जाएगा। मगर यहाँ क्या हुआ। यहाँ तो नुपूर शर्मा अपनी FIR एक जगह ट्रांस्फर कराने के लिए कोर्ट गई थी और कोर्ट ने खुद उनके बयान पर स्वत: संज्ञान लेकर उन्हें सुना दिया।

सुप्रीम कोर्ट के जज बताएं नुपुर का बयान भड़काऊ कैसे:–

जस्टिस ढींगरा ने ये भी कहा कि यदि अब सुप्रीम कोर्ट के जज को ये पूछा जाए कि नुपूर शर्मा का बयान किस तरह से भड़काने वाला है, इस पर वह आकर न्यायालय को बताएँ, तो उन्हें पेश होकर ये बात कोर्ट को बतानी पड़ेगी। जस्टिस ढींगरा ने यहां तक कह दिया कि यदि वो ट्रायल कोर्ट के जस्टिस होते तो वो सबसे पहले इन्हीं जजों को बुलाते और कहते, आप आकर गवाही दीजिए और बताइए नुपूर शर्मा ने किस तरह से गलत बयान दिया और उसे आप कैसे देखते हैं। टीवी मीडिया और चंद लोगों के कहने पर आपने अपनी राय बना ली। आपने खुद क्या और कैसे महसूस किया, यह कोर्ट को बताएँ। 

सुप्रीम कोर्ट खुद ताकत के नशे में :–

जस्टिस ढींगरा ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि जिस तरह नुपूर शर्मा को सर्वोच्च न्यायालय ने ये कह दिया कि उनके सिर पर ताकत का नशा था, क्योंकि उनकी पार्टी सत्ता में थी। यही बात उच्चतम न्यायालय पर भी एप्लाई होती है। अदालत किसी को मौखिक तौर पर दोषी नहीं ठहरा सकती। उन्होंने कहा कि यह टिप्पणियाँ बताती हैं कि सुप्रीम कोर्ट खुद ताकत के नशे में है। सड़क पर खड़ा व्यक्ति यदि मौखिक रूप से कुछ कह दे, तो लोग उसे गंभीरता से नहीं लेते, किंतु यदि सुप्रीम कोर्ट कुछ कहे तो इसका महत्व होता है। उन्होंने इस मामले पर ऐसी मौखिक टिप्पणी देकर लोगों को मौका दे दिया है कि सुप्रीम कोर्ट की आलोचना करें। सुप्रीम कोर्ट अपने आपको इस स्तर पर ले गया कि एक मजिस्ट्रेट भी इस प्रकार के काम नहीं करता। वो भी मौखिक रूप से नहीं बोलते। 

सिर्फ FIR के आधार पर गिरफ्तारी गलत :–

एसएन ढींगरा ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट का काम था नुपूर शर्मा की याचिका पर सुनवाई करना। नुपुर के पास पर्याप्त वजह थी न्यायालय तक जाने की। उन्हें धमकियाँ मिल रही थीं और उनका समर्थन करने वालों की हत्याएं हो रहीं थी। जस्टिस ढींगरा ने कहा कि जैसे सुप्रीम कोर्ट ने ये पूछा है कि आखिर नुपूर पर हुई FIR पर क्या एक्शन लिया गया। तो केवल FIR के आधार पर गिरफ्तारी गलत है। जब तक ये सिद्ध न हो कि FIR सही है, तब तक उस शख्स को गिरफ्तार करना गलत है।

नूपुर शर्मा से अधिक जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट की :–

जस्टिस ढींगरा ने कहा कि नुपूर शर्मा का जितना दायित्व है कि वो सोच समझ कर अपनी बात कहे, उससे अधिक जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट की है कि वो अपनी बात को सोच समझ कर बोलें । वो क्यों ऐसी टिप्पणी कर रहे हैं। यदि उन्हें लगता है कि वो राजा है और कुछ भी बोल सकते हैं तो ये अधिकार तो हर कोई सोचता है। उन्होंने बताया कि अब आगे सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी के बाद यही विकल्प है कि नुपूर हर उच्च न्यायालय में जाकर गुहार लगाएँ और कहें कि उनके खिलाफ दर्ज FIR को ट्रांस्फर करें या फिर उसे खारिज कर दें। 

सोशल मीडिया पर भी हुआ विरोध :– 

नूपुर शर्मा पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने #SupremeCourtIsCompromised और #BlackDayForIndianJudiciary हैशटैग का इस्तेमाल करके अपना विरोध जताया। शैफाली वैद्य ने लिखा है कि, 'जस्टिस कांत और परदीवाला ने मूल रूप से #NupurSharma को जान से मारने की धमकी को वैधता प्रदान की है। #BlackDayforIndianJudiciary। वहीं, एक यूज़र ने लिखा है कि, 'वो शिवलिंग को बार-बार प्राइवेट पार्ट कहें, तो चुपचाप सुन लो, नहीं तो वहां से चले जाओ, वो उकसाएं तो भी कुछ न बोलो। क्योंकि तुमने कुछ बोला तो वो तुम्हारी हत्या कर देंगे और कोर्ट तुम्हारी हत्या का इल्जाम तुम्हारे 'बोलने' पर ही लगा देगा।' एक अन्य यूज़र ने लिखा कि, 'यदि उदाहरण से समझा जाए, तो एक व्यक्ति को अपमान सहन नहीं हुआ तो उसने पलटवार में अपमान किया, वहीं दूसरे व्यक्ति को अपमान सहन नहीं हुआ और उसने हत्या कर दी। अब देश की सबसे बड़ी अदालत को ये देखना था कि दोनों में से बड़ा दोषी कौन ? कोर्ट के अनुसार- दोषी बयान देने वाला, हत्यारे नहीं।

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