व्यापारियों को मुनीम बना देगा जीएसटी

केंद्र की राजग सरकार का दावा है कि वस्तु एवं सेवा कर की नई प्रणाली जीएसटी संशोधित विधेयक-2015 संसद से पारित हो जाने से देश में विदेशी निवेश को आकर्षित करना आसान हो जाएगा। नई कर प्रणाली से, करों की समानता से भ्रष्टाचार और राजकोषीय घाटे में कमी आएगी। साथ ही व्यापारी वर्ग के कर चुकाने पर सरकार की सीधी नजर भी बनी रहेगी। आशंकाओं के बीच अलग-अलग राजनीतिक दलों और खेमों में बंटे व्यापारी संगठन और उनके नेता जीएसटी के खिलाफ देश और राज्यों में केंद्र के विरुद्ध एकजुट हो गए हैं, लेकिन केंद्र सरकार की जीएसटी बिल विषय पर यात्रा के पूर्ण हो जाने के बाद अब आखिरी वक्त में एकाएक देश के मंझोले व्यापारी का विरोध-प्रदर्शन करना अर्थपूर्ण नहीं लग रहा है। यह सिर्फ व्यवधान पैदा करने की कोशिश नजर आ रहा है। व्यापारी संगठनों के जीएसटी बिल के विरोध में उतरने और संसद में प्रतिपक्ष कांग्रेस की राजनीतिक गतिविधियों को देखते हुए तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) व समाजवादी पार्टी (सपा) द्वारा जीएसटी बिल पर साफ तौर से असहमति जता देने के बाद स्पष्ट हो गया है कि मामले में अभी सियासी खिचड़ी और पकेगी। इस बीच उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में व्यापारी संगठन और नेता जीएसटी को लेकर केंद्र की राजग सरकार के विरुद्ध अपने तेवर कड़े किए हुए हैं और संसद में पेश हो चुके जीएसटी बिल में आधा दर्जन बिंदुओं में बदलाव और नए बिंदु जोड़ने की मांग कर रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी के प्रति नरम रुख रखने के आदी कारोबारी और व्यापारी संगठनों के नेताओं ने भी इस नए जीएसटी संशोधित बिल-2015 के विरोध में उतरने की घोषणा कर चुके हैं। उत्तर प्रदेश सरकार और सूबे में सत्तारूढ़ सपा ने केंद्र सरकार के जीएसटी प्रस्ताव के बारे में अभी कोई फैसला नहीं लिया है। मुख्यमंत्री द्वारा निर्णय लिया जाना बाकी है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा है, हमें जीएसटी लागू किये जाने से होने वाले नुकसान का अभी आकलन करना है। केंद्र सरकार राज्यों के नुकसान की भरपाई किस तरह करेगी, यह पता लगने के बाद ही हम इस बारे में कोई फैसला लेंगे। मुख्यमंत्री ने जीएसटी को लेकर व्यापारी तथा अन्य संगठनों द्वारा किए जा रहे आंदोलन की आलोचना करते हुए कहा है कि उनको वास्तविकता का पता नहीं है और महज शक के आधार पर वे शोर-शराबा कर रहे हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में राजग गठजोड़ को परास्त कर दिल्ली पहुंचे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जीएसटी बिल को पारित कराने में सहयोग का आश्वासन दिया है। नीतीश का यह सकारात्मक कदम है। वहीं उत्तर प्रदेश में सपा की घोर प्रतिद्वंद्वी और चार बार राज्य की मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती पर सीधा निशाना साधते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश ने कहा है कि जीएसटी बिल के बारे में मायावती को कोई तथ्यात्मक जानकारी नहीं है।

अखिलेश का यह आकलन जीएसटी के मुद्दे पर मायावती के रुख में बनी नरमी और बिल को पास कराने में मदद की बसपा प्रमुख की खुली घोषणा करने के क्रम में है। सपा जीएसटी के मौजूदा स्वरूप को लेकर चिंतित है, क्योंकि अगर मौजूदा स्वरूप में जीएसटी बिल पास होता है तो इसका प्रतिकूल आर्थिक और वित्तीय प्रभाव उत्तर प्रदेश पर पड़ने की आशंका है। देखा जाए तो इसकी जानकारी मायावती को भी होनी चाहिए। उन्हें सोचना चाहिए कि अगर इसका प्रभाव अच्छा पड़ता तो व्यापारी इसका विरोध क्यों करते? मायावती को अपना रुख नरम करने से पहले इंतजार करना चाहिए था, क्योंकि संसद में इस पर अभी चर्चा होनी है और चर्चा के बाद ही कई बातें स्पष्ट होगी कि यह बिल यूपी के कितना हित में है। ऐसे में पहले ही इस बिल के पक्ष में नरम होना, खुला समर्थन देना गलत है। ऐसा मायावती को नहीं करना चाहिए, यह अखिलेश ने जोर देकर कहा है। अर्थव्यवस्था को एकीकृत रूप दिए जाने और केंद्र-राज्यों के बीच कई स्तरों पर कर संबंधी कर संग्रह की जटिलताओं को खत्म करने के लिए वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम का मूर्त रूप लेना विशेषज्ञ बेहद जरूरी मानते हैं। दुनिया के करीब डेढ़ सौ देश अपने यहां इस तरह की कर व्यवस्था लागू कर चुके हैं, हमारे देश में इस तरह की व्यवस्था एक लंबे समय से अपेक्षित रही है। यह दुर्भाग्य है कि राजनीतिक दल जीएसटी जैसे महत्वपूर्ण बिल पर अज्ञानतावश राजनीति कर रहे हैं।

जीएसटी की दर कम हो, इस विषय-विरोध के झंडे को कांग्रेस थामे हुई है। यह राजनैतिक परंपराओं के हिसाब से अनुचित है। सभी को याद रहे कि अब राष्ट्रपति और तब यूपीए-2 के वित्तमंत्री रह चुके प्रणब मुखर्जी ही कर संग्रह की जटिलताओं को खत्म करने के लिए जीएसटी को लेकर आए थे और विगत 6 मई, 2015 को कांग्रेस के बहिष्कार के बावजूद 122वे संशोधन अधिनियम के बाद जीएसटी बिल को लोकसभा में दो-तिहाई से स्वीकृति मिल चुकी है। इन सबके बीच केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली के अनुसार, यह व्यवस्था सरकारों, उद्योगों-सेवाओं और उपभोक्ताओं सभी को फायदा देने वाली सिद्ध होगी। इसमें उन राज्यों को अधिक फायदा होगा, जहां खपत अधिक होगी। देश के बड़े राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, राजस्थान, पश्चिम बंगाल आदि को अपनी राजस्व वृद्धि और प्रतिव्यक्ति आय बढ़ाने के अवसर मिलेंगे, जैसे-जैसे विकास दर गति पकड़ेगी, प्रत्येक राज्य के राजस्व में वृद्धि होगी। उधर, उत्तर-प्रदेश उद्योग व्यापर मंडल के अध्यक्ष पूर्व भाजपा सांसद श्याम बिहारी मिश्र का इस विषय पर साफ कहना है कि जीएसटी बिल सिंगल विंडो भी नहीं है। इसे बनाने और संसद में ले जाने तक की प्रक्रिया में पूर्व और वर्तमान की सरकार ने व्यापारियों को विश्वास में नहीं लिया है। इस वस्तु कर अदायगी के बिल को ब्यूरोक्रेट्स, उद्योगपतियों और बड़े कारोबारियों ने बनाया है, जबकि राजस्व का बड़ा भाग लघु व्यापारियों से ही प्राप्त होता है।

दुनिया के करीब डेढ़ सौ देश अपने यहां इस तरह की कर व्यवस्था लागू कर चुके हैं। सर्वप्रथम फ्रांस ने 1954 में जीएसटी व्यवस्था लागू की थी। दरअसल, कर-प्रणाली हमारे संविधान के भाग (क) के अंतर्गत अनुच्छेद 268 से 281 के मध्य केंद्र और राज्यों के बीच करों के अधिरोपण और वितरण संबंधी प्रावधान किए गए हैं, जिनके तहत राज्यों में बिक्री कर, चुंगी, वैट समेत तमाम कर राज्य सरकार लगाती है और केंद्रीय कर जैसे उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क आदि केंद्र सरकार लगाती है। वर्तमान प्रणाली में निर्माता को वस्तु के उत्पादन व बिक्री तक कई स्तरों पर कर चुकाना पड़ता है, लेकिन जीएसटी व्यवस्था में सिर्फ अंतिम स्तर पर कर अधिरोपण का प्रावधान है। इसके द्वारा जहां एक ओर करों के संग्रह को बढ़ाया जा सकेगा, वहीं करों पर छूट के कई गैर-जरूरी तौर-तरीकों को भी कम किया जा सकेगा। जीएसटी का चर्चा शुरू हुए करीब एक दशक हो गया है। यूपीए सरकार के दौरान जब इसकी पहल हुई, तब जीएसटी पर आम सहमति बनाने के लिए राज्यों के वित्त मंत्रियों की एक उच्चाधिकार समिति बनी और समिति कभी आम राय पर नहीं पहुंच पाई। कांग्रेस के कार्यकाल में गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे भाजपा शासित राज्य भी अधिकांसबार असहमति ही प्रकट करते रहे। विपक्ष में भाजपा राज्यों को तब अंदेशा यह रहा कि जीएसटी के लागू होने पर कराधान में उनकी स्वायत्तता नहीं रहेगी और उन्हें राजस्व का नुकसान भी होगा, लेकिन अब भाजपा शासित राज्य देश के वित्तमंत्री जेटली के कथन और आश्वासन के बाद से बिल्कुल चुप हो गए हैं।

आर्थिक विकास में जटिलताओं को दूर करने की दिशा में जीएसटी का महत्व इसलिए और भी है, क्योंकि यह बिक्री के स्तर पर वसूला जाएगा और निर्माण लागत पर लगाया जाएगा। इससे राष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं और सेवाओं के बाजार मूल्य में समानता के साथ-साथ दोनों में कमी भी आएगी। यह कर प्रणाली पूरी मांग-आपूर्ति श्रंखला को प्रभावित कर जहां एक ओर प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि करेगी, वहीं सरकार के बजटीय और राजकोषीय घाटे में भी कमी लाएगी, जो देश में आर्थिक सुधार की दिशा में सरकारों के लिए यह बिल बड़ा कदम है, क्योंकि पिछले कई वर्षो से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कराधान में सुधार की मांग की जा रही थी। जीएसटी में जो व्यवस्था लाई गई है, उनमें अब आठ रिटर्न को महीने की पहली तारीख से बीस तारीख तक भरना होगा, ऐसे में उसका व्यापार और दुकान कैसे चलेगी, मध्यम और ग्रामीण व्यापारियों को जीएसटी के रूप-प्रारूप के बारे में कोई जानकारी नहीं है। देश में व्यापारियों की संख्या करीब 10 करोड़ से अधिक है। इनमें चार करोड़ व्यापारी गांव से हैं। ऑनलाइन की अनिवार्यता से इन पर ज्यादा असर पड़ेगा। वे न तो इंटरनेट रखते हैं और न ही उनमें बहुत से व्यापारी शैक्षिक हैं। ऐसों का कर-संग्रहण के भ्रष्ट तंत्र का शिकार होना लाजमी है। इसके साथ ही व्यापारी संगठनों की ये भी दलील है कि व्यापारी को दिनभर बिजली उपलब्ध होती नहीं है। शाम और रात को दुकान बंद कर जब वह घर पहुंचेगा, तब रिटर्न मोमबती के उजाले में कैसे और कहां रिटर्न भरेगा। हालत यह होगी कि व्यापारी सीए के यहां दिनभर चक्कर काटता घूमेगा या फिर व्यापारी मुनीम बन जाएगा।

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