वाकई संत दर्शन बड़े दुर्लभ हैं भाई!

इन दिनों मध्यप्रदेश में विदेशी, देशी पर्यटकों का हुजूम उमड़ रहा है। यहां के विभिन्न जिलों के रेलवे स्टेशनों, बस स्टाॅप्स और सड़कों पर बड़े - बड़े होर्डिंग्स लगे हैं जो आने वालों का स्वागत कर रहे हैं। जी हां, ये सभी मप्र के धार्मिक और पर्यटन नगर का रास्ता बता रहे हैं। जैसे ही आप रेलवे स्टेशन से बाहर आते हैं आॅटो, टैक्सी चलाने वाले आप से सवाल करने लगते हैं बड़ी उम्मीद से वे आपकी ओर देखते हैं।

इंदौर के पास बसे धर्म नगर उज्जैन जाने पर तो जैसे आपको कुछ समझ ही नहीं आता। बात चाहे इंदौर रोड़ की हो, आगर रोड़ की या फिर देवासरोड़ की। लोकल ट्रांसपोर्टेशन एरिया के पास जाते ही सवारियों की भीड़, वाहनों में बैठाने के लिए आवाज़ लगाते टाटा मैजिक, आॅटो वाले और जलपानगृहों पर नाश्ता करते लोग आपको अपनी ओर खींचते हैं। बस में भारी धक्का मुक्की के बीच जैसे तैसे आप चढ़ते हैं और उज्जैन पहुंचने पर सारी धक्का - मुक्की जैसे भूल जाते हैं।

यहां आने पर लगता है जैसे मुद्दतों की तमन्ना पूरी हो गई। यहां भूख मिटाने के लिए रेस्टोरेंट हैं, तो प्यास मिटाने के लिए जगह - जगह प्याऊ लगे हैं। प्याऊ देखकर आपको भी हैरानी होती होगी कि जिस दौर में रेल से महंगा पानी लाया जाता हो उस दौर में प्याऊ पर लोगों का गला कैसे तर होता है। खैर, इसे इसलिए ही तो धर्म नगरी कहते हैं। इसके बाद सवारियों से भरी टाटा मैजिक में यात्री चढ़ जाता है और करीब 10 से पंद्रह मिनट में सिंहस्थ क्षेत्र में पहुंच जाता।

यहां आकर वह बेहद सुकून का अनुभव करता है। जगह - जगह रेस्टोरेंट, प्याऊ और भरी दोपहरी में छांव देते पांडाल और कुछ शेड्स तीर्थ यात्रियों की थकान को मिटा देते हैं। यात्री विचार करता है हो न हो भगवान तो यहीं पर बसते हैं। बस स्वामी जी मिल जाऐं। उनके दर्शन हो जाए तो जीवन सफल हो जाए। यात्री कुछ थकान दूर कर और प्याऊ का ठंडा पानी पीकर आगे बढ़ता है

तो फिर नर्मदा मैया और शिप्रा मैया के संगम को देखकर रहा नहीं जाता। लाल पत्थर से सजे सुंदर और बड़े - बड़े घाट और शिप्रा मैया का चमकता आंचल देखकर यात्री स्नान के लालच में पड़ ही जाती है। घाट पर पहुंचकर वह नदी के जल में डुबकी लगाता है। डुबकी लगाने के बाद जो सुख उसे मिलता है वह बयां नहीं कर पाता।

डुबकी लगाने के बाद वह बाबाओं के पांडालों की ओर चल देता है। यहां पर हर तरह के बाबा हैं। कोई सिद्ध बाबा है तो कोई नागा सन्यासी है। नागा सन्यासी श्रद्धालुओं को बड़ी आसानी से दर्शन देते हैं। इसके अलावा कुछ ऐसे बाबा भी हैं जिनके पास बड़ी भीड़ है। जिनके नाम बड़े हैं और इनके पांडालों की दीवारें किसी महल से कम नहीं सजीं। इनके महल में श्रद्धालु प्रवेश तो कर लेता है मगर बाबा कहीं नज़र नहीं आते।

वह भूल जाता है कि बाबा अपने विशेष भक्तों में मस्त हैं। वह दर्शन की आस लिए उनके पांडाल में जाता है लेकिन बाबा तो कहीं दिखाई ही नहीं दे रहे। हां, बाबा की प्रदर्शनियां जरूर हैं जिनमें बाबा के जीवन से जुड़े चित्र हैं। साथ ही ज्ञान की बातें बताने वाली और धर्म का प्रचार करने वाली सामग्रियां जरूर हैं। बड़ी देर तक बाबा को तलाशने के बाद उसे पता लगता है कि बाबा तो भगवान से भी दुर्लभ हो गए। जहां बाबा है वहां तक पहुंचने के लिए उसे विशेष कार्ड की जरूरत है।

जिसे पास कहते हैं अब यह पास तो किसी मंदिर में ले जाने वाले प्रसाद, फूल से भी कीमती हो गया। थक हार कर जब वह आगे जाने लगता है तो बाबा के प्रबंधकों का अनाउंसमेंट उसे सुनाई देता है। अन्नक्षेत्र में पंक्ति से भोजन कीजिए। सभी का स्वागत है। बस यह सुनकर उसके पेट में कूद रहे चूहे उसे धैर्य नहीं रखने देते। 

उसके कदम अन्नक्षेत्र की ओर चल पड़ते हैं। यहां दरी पर बैठकर वह भोजन करता है। इस भोजन में उसे तृप्ति का आनंद मिलता है इसके बाद वह अन्नक्षेत्र से बाहर निकलता है और अगले पांडाल की ओर बढ़ चलता है क्योंकि बाबा के दर्शन तो वाकई में दुर्लभ हो गए हैं इसके लिए उसे कार्ड की जरूरत है। वह मन ही मन हंसता है और कहता है बाबा के दर्शन मिले नहीं तो क्या उनके प्रसाद से ही काम चला लेंगे।

फिर बाबा से मिलने के लिए आगे के 12 वर्ष हैं तब तक तो उनका शिष्य भी तैयार हो जाएगा। यह सोचकर वह आगे निकलता है। चित्र - विचित्र सन्यासियों की नगरी में सन्यासियों के त्याग के साथ वैभव, विलासिता को देखकर वह आश्चर्य में पड़ जाता है।

दूसरे पांडालों में जब वह नज़र दौड़ाता है तो उसे देखकर आश्चर्य होता है कि जो बाबा अब तक दुर्लभ थे उन्हीं के समान अन्य बाबा के पांडाल में भक्तों की कतार लगी है। यहां पर बाबा तो नहीं मगर उनकी मूर्ति का पूजन हो रहा है। उनका सिंहासन सोने से सजा है, आसपास भी सोने और चांदी का सामान नज़र आ रहे हैं।

अबकी बार तो वह बहुत आश्चर्य करता है। जब वह सोमनाथ गया था तो वहां भी उसे इतना सोना - चांदी नज़र नहीं आया था। सोने से लदे बाबा को दूर से नमस्कार कर वह वापस लौट जाता है। अपनी पोटली खोलता है। पोटली में कुछ रोटियां, पुदीना की चटनी और प्याज होता है जो मां ने उसे बांधकर दिया था।

उसकी महक से ही उसकी सारी थकान दूर हो जाती है। एक पेड़ के नीचे बैठकर वह इसका आनंद लेता है और अपने गांव वापस लौट जाता है। अब उसे जीवन का अर्थ समझ आ रहा है असली आनंद तो उसे शिप्रा के घाट पर, मां की रोटी - चटनी में और अपने द्वारा की जाने वाली मेहनत में ही नज़र आने लगता है।

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