JNU में नारेबाजी का मसला हो रहा राजनीति से प्रभावित

Feb 13 2016 06:38 PM
JNU में नारेबाजी का मसला हो रहा राजनीति से प्रभावित

दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में देशद्रोही नारेबाजी करने का विवाद तूल पकड़ता नज़र आ रहा है। इस मामले में राजनीतिक बयानबाजी अधिक होने लगी है। जहां विश्वविद्यालय परिसर में आंदोलन कर दोषियों को सजा देने की बात कही जा रही है वहीं यह मसला हिंदूवादी बनाम गैर हिंदूवादी शक्तियों के बीच उलझता जा रहा है। अब तक तुष्टिकरण की नीति अपनाने के पक्षधर कांग्रेस और कम्युनिस्ट विचारधारा के समर्थक वामदलों ने इस मामले को हल्के तरह से लेने की बात कही है।

इन नेताओं का कहना है कि सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है जबकि केंद्र में सत्तासीन भाजपा और हिंदूवादी समर्थक इस मामले को देशद्रोह बताकर दोषियों पर कार्रवाई की बात कर रहे हैं। अब इस मामले में यह भी कहा जाने लगा है कि कुछ लोग भारत में रहकर पाकिस्तान समर्थित नारे लगाते हैं। यह ठीक नहीं है। इसे देशद्रोह ही कहा जाना चाहिए। हां, इस मामले में जिस तरह से राजनीतिक माहौल गर्मा रहा है वह देश में सांप्रदायिकता को बढ़ा सकता है।

हालांकि जहां ऐसा देश जो भारत में आतंकवाद को प्रेरित करने के लिए जिम्मेदार रहा हो उस देश की जयकार करना देशद्रोह की श्रेणी में ही आता है। दूसरी ओर जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कही जा रही है उसका एक दायरा है। किसी को भी ऐसी स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती है जो राष्ट्र की अखंडता को प्रभावित करे। ऐसे में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में आतंकी अफजल गुरू की बरसी को लेकर किए जाने वाले आयोजन और इसमें लगने वाले नारों पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं लेकिन इस मामले को राजनीतिक तूल देना और फिर संप्रदायवाद की ओर मोड़ना उचित नज़र नहीं आता।

हालांकि विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर द्वारा प्रेस क्लब में पार्टी आयोजित किए जाने और उसमें भारत विरोधी नारे लगने की घटना भी कम गंभीर नहीं है। तो दूसरी ओर प्रोफेसर एक वर्ग विशेष से आते हैं लेकिन इसका यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि इस वर्ग विशेष के सभी लोग इस तरह के विचारों से प्रेरित है। हालांकि पाकिस्तान समर्थित नारेबाजी होने और कई बार जम्मू - कश्मीर क्षेत्र में आईएअआईएस और पाकिस्तान समर्थित ध्वज लहराए जाने से यह बात जरूर साफ होती है कि कुछ तत्व ऐसे जरूर हैं जो स्वयं को इस देश का नागरिक नहीं मानते हैं।

इन लोगों पर कड़ी कार्रवाई करने की बात कही जाती रही है। क्योंकि यह देशद्रोह के तहत आता है। ठीक उसी तरह पाकिस्तान के समर्थन में नारेबाजी की बातें भी देशद्रोह में ही शामिल है। कांग्रेस द्वारा इस मसले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखना एक वर्ग विशेष को समर्थन देना दर्शा रहा है। ऐसे में कांग्रेस की यह मंशा साफ नज़र आ रही है कि वह विपक्ष में बैठने के बजाय सत्ता हासिल करने के प्रयास कर रही है तो तुष्टिकरण का पत्ता चलकर अपने जनाधार को बनाने में लगाी है। ऐसे में देश की राष्ट्रीय एकता और अखंडता पर प्रभाव पड़ रहा है। 

'लव गडकरी'