क्या अधिक नोट छापकर भारत बन सकता है सबसे अमीर ?


लॉकडाउन और कोरोनावायरस की वजह से दुनिया अभूतपूर्व संकट से जूझ रही है. कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने के लिए दुनिया के अधिकतर हिस्सों में लॉकडाउन लागू है. इससे लोगों की आजीविका पर बहुत अधिक असर पड़ा है. दुनियाभर के अधिकतर देशों में लोग अपनी सरकारों से सीधी मदद मांग रहे हैं. हालांकि, सरकारों के हाथ भी बंधे हुए हैं और वह एक सीमा तक ही राहत पैकेज दे सकती है. ऐसे में कई लोगों के मन में यह सवाल आता होगा कि किसी भी देश के पास नोट छापने की अपनी मशीन होती है तो वह बड़ी संख्या में नोट छापकर गरीबों, वंचितों और मध्यम वर्ग के लोगों को क्यों नहीं बांट देता है? इसके साथ ही एक और सवाल कौंधता होगा कि गरीब देश अधिक-से-अधिक नोट छापकर अमीर क्यों नहीं बन जाते हैं? ऐसे में हमने एक्सपर्ट्स से बात करके इस बारे में जानना चाहा कि आखिर केंद्रीय बैंक या सरकार के अधिक नोट छापने पर देश की इकोनॉमी पर क्या असर पड़ता है.

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आपकी जानकारी के लिए बता दे कि जीडीपी के दो से तीन प्रतिशत के बराबर नोट छापता है. इस कारण अधिक नोट छापने के लिये जीडीपी को बढ़ाना जरूरी होता है और जीडीपी बढ़ाने के लिये विनिर्माण व सेवा जैसे विभिन्न क्षेत्रों की वृद्धि, व्यापार घाटे को कम करने आदि जैसे कारकों पर ध्यान होता है.

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अगर आपको नही पता तो बता दे कि जानी-मानी अर्थशास्त्री बृंदा जागीरदार से जब इस बाबत सवाल किया गया तो उन्होंने कहा, ''हम इस बात को जिम्बाब्वे और वेनेजुएला में उपजी परिस्थितियों के जरिए आसानी से समझ सकते हैं. इन दोनों देशों की सरकारों ने कर्ज के निपटारे के लिए बड़े पैमाने पर नोट छापे. हालांकि, आर्थिक वृद्धि, सप्लाई और डिमांड के बीच सामंजस्य नहीं होने के कारण इन दोनों देशों में महंगाई आसमान पर पहुंच गई.'वही,अफ्रीकी देश जिम्बाब्वे और दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला ने अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए अधिक नोटों की प्रिंटिंग की. हालांकि, इन देशों ने नोटों की जितनी अधिक छपाई की, महंगाई उतनी अधिक बढ़ती गई और ये दोनों देश 'Hyperinflation' यानी बहुत अधिक महंगाई के दौर में पहुंच गए. वर्ष 2008 में जिम्बाब्वे में महंगाई दर में 231,000,000% की वृद्धि दर्ज की गई.

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