भगदड़ से हारी ज़िंदगी

By Sandeep Meena
Sep 25 2015 08:02 AM
भगदड़ से हारी ज़िंदगी

मक्का के क्रेन हादसे में मरे हज यात्रियों का जख्म अभी भरा भी नही था की वही पर भगदड़ ने सेकड़ो लोगो की की ज़िंदगी को पैरो तले रौंद दिया। पिछले दो दशको में मक्का में होने वाला यह सबसे भीषण हादसा है। मुस्लिम धर्मावलम्बियों के लिए हज यात्रा सबसे पुण्य माना जाता है। हर साल लाखो की तादाद में यात्री हज करने जाते है ताकि पुण्य कमा सके। लेकिन अफ़सोस की बात है की हर साल छोटे बड़े हादसे सेकड़ो लोगो की हंसती मुस्कुराती ज़िंदगी पर ग्रहण लगा जाते है। कभी भगदड़ तो कभी मशीन का गिरना कभी दूसरे हादसे।

सवाल यह भी उठता है की लाखो हज यात्रियों के लिए मक्का जैसी बड़ी तीर्थ जगह पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम क्यों नही किये जाते है। बीते ढाई दशक में कई हादसों ने चार हज़ार से भी अधिक हज यात्रियों की ज़िंदगी पर ग्रहण लगा दिया है। घायलो का आंकड़ा इससे कही गुना अधिक है। ऐसा नही है की हादसे सिर्फ मक्का में ही होते है। दुनियाभर के तमाम देशो में धार्मिक आयोजनो व तीर्थ स्थानो पर हादसे होते रहते है लेकिन मक्का में एक स्थान पर लाखो की तादाद में लोग एकत्रित होते है। ऐसे में स्थानीय प्रशासन को ऐसा बंदोबस्त करना चाहिए की भगदड़ का संदेह ही न रहे। मक्का में सबसे अधिक मौत शैतान को पत्थर मरने की रस्म अदा करने के समय ही होती है।

जाहिर सी बात है प्रशासन को स्थिति को पूर्व भांपकर सुरक्षा के कड़े इंतजाम पहले ही करना चाहिए जिससे की ऐसे हादसे न हो। पत्थर मारने की दौड़ में भीड़ को बेकाबू होने का मौका ही क्यों दिया जाता है? प्राचीन ज़माने की बात जाने दी जाए, लेकिन आज के दौर में संसाधन बढ़ रहे है तो ऐसे हादसे होना प्रशासनिक व्यवस्थाओ पर कई सवालिया निशान खड़े करते है। वर्ष 2006 में भी शैतान को कंकड़ मारने के दौरान 346 जिंदगियां मौत के मुंह में समां गई थी जिसमे 51 भारतीय थे। इसी महीने में क्रेन हादसा हुआ जिसमे 11 भारतीयों समेत 100 से अधिक लोगो ने अपनी जान गंवा दी थी। ऐसे विराट आयोजनो को शांतिपूर्ण संपन्न कराने में सरकार और प्रशासन की अहम जिम्मेदारी होती ही है लेकिन श्रद्धालुओं की लापरवाही को भी नज़रअंदाज़ नही किया जा सकता है।

हमेशा देखा जाता है की भगदड़ मचने का मुख्य कारण लोगो का उतावलापन होता है। पहले पत्थर मारना, पहले दर्शन करना भगदड़ की वजह बनता है। फिर चाहे वह जोधपुर में मेहरानगढ़ का चामुंडा देवी मंदिर का हादसा हो या फिर हिमाचल प्रदेश के नैना देवी मंदिर का हादसा। ईद के एक दिन पहले हज में मची भगदड़ ने सेकड़ो परिवारो के घरो में त्यौहार का रंग फीका कर दिया है। ओंझल हो गए है आँखों के वह सपने जो ईद मानाने को लेकर भगदड़ से एक दिन पहले मृत लोगो के परिवार वालो ने देख रखे थे। थम गई वह मुस्कान जो मासूम बच्चो ने दावत को लेकर अपने होंठो पर सजाई थी। प्रशासनिक अव्यवस्थाओ और लोगो की लापरवाही के चलते सेकड़ो जिंदगियां कुर्बान हो गई है।

संदीप मीणा