चीन के खिलाफ आंदोलन से लेकर भारत आगमन तक, जानिए 'दलाई लामा' के बारे में सबकुछ

नई दिल्ली: जब भी आप तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा से मिलते हैं, तो वे आपके सिर पर आशीर्वाद का हाथ अवश्य रखते हैं। आप महसूस करेंगे कि उनका आपके सिर पर हाथ रखना, एकदम मां के ममत्व भरे आशीर्वाद जैसा होता है। उनका ये आशीर्वाद सबके लिए एक समान है। इसके साथ में करुणा से भरे अद्भुत इंसान का प्यार और वो मुस्कराहट मिलती है, जो आपको उन्हें छोड़ने नहीं देती।

मंगलवार, 6 जुलाई 2021 को इस महान संत का 86वां जन्मदिन है। वे एक अद्भुत आंदोलनकारी भी हैं, वो इस लिहाज से कि वह तिब्बत की स्वायत्तता के लिए अपना सबकुछ बलिदान करने के लिए तैयार हैं। तिब्बत की आजादी के लिए अपनी जन्मभूमि तक छोड़ने तक के लिए राज़ी हैं दलाई लामा। चीन की तिब्बत पर कब्जे की गुस्ताखी के बाद भारत में दलाई लामा को आए हुए 62 वर्ष से अधिक हो गए हैं। उन्होंने तिब्बत की आजादी के लिए संघर्ष करते हुए अपनी आधी से अधिक जिंदगी बिता दी है। संघर्ष का जो रास्ता उन्होंने 23-24 वर्ष की उम्र में चुना, उससे वह कभी भी डिगे नहीं।

महज 23 वर्ष 9 माह की आयु में जब उन्होंने भारत में कदम रखा, तब देवभूमि हिमाचल के मैक्लोडगंज को उन्होंने अपनी कर्मभूमि बनाया। महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं को तो उन्होंने अपने जीवन में उतार ही लिया था, भारत में आकर उन्होंने महात्मा गांधी के जीवन आदर्शों पर भी अमल करना शुरू कर दिया। तिब्बत पर चीन के कब्जे के विरुद्ध उन्होंने पूरी दुनिया को लामबंद किया। साथ ही विश्वभर में फैले तिब्बतियों को एक मंच पर लाए। आत्मीयता भरी संगठन शैली से निर्वासन के दौरान भी उन्होंने लोकतंत्र के मूल्यों को प्रत्येक तिब्बती के दिल में भर दिया। इसी का परिणाम है कि निर्वासित तिब्बत सरकार का बाकायदा चुनाव होता है। चुने गए पीएम को बड़ी आसानी से सत्ता का हस्तांतरण होता है। सबसे रोचक है कि हारे हुए प्रतिनिधि जीते हुए नेता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जनता की भलाई के लिए काम करते हैं।

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