आखिर कब थमेगा जेएनयू से उपजा विवाद

Feb 17 2016 08:22 PM
आखिर कब थमेगा जेएनयू से उपजा विवाद

देशभर में करीब 3 दिनों से एक ही विषय पर चर्चा चल रही है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारेबाजी को लेकर विरोध का माहौल बनाया जा रहा है। जिसे पकड़ा गया है, अब यह सामने आ रहा है कि वह इस नारेबाजी में शामिल ही नहीं था। असल में नारे लगाने वाले कहां है किसी को नहीं पता। अब इस विवाद को हाईलाइट्स में से हटाने के लिए दूसरे और विवाद हो रहे हैं। पत्रकार पीटे जा रहे हैं, विद्यार्थियों को मारा जा रहा है और तो और काला कोट पहनने वालों ने भी नारेबाजी का दामन थाम लिया है। 

आखिर इतना विवाद और हंगामा क्यों। पहले तो इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ा गया। जिन्होंने इस मामले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ा वे अब खामोश हैं। मगर अच्छी खासी राजनीतिक आग लग चुकी है। इस आग में राजनीतिक स्वार्थ की रोटियां सेकी जा रही हैं। दूसरी ओर विचारों को प्रेरित करने वाले विद्यार्थियों की शिक्षा के लिए अहमियत रखने वाले इस उच्च शैक्षणिक संस्थान में केवल देशद्रोही नारों को लेकर इतना बवाल मच रहा है कि विश्वविद्यालय परिसर में अध्ययन को लेकर विद्यार्थी चिंतित हो रहे हैं। 

जेएनयू विश्वविद्यालय की साख भी प्रभावित हो रही है। हां उमर खालिद को लेकर जो बात सामने आई है कि वह देश के और भी 18 विश्वविद्यालयों को देशद्रोही नारों से प्रभावित करने की योजना बना रहा था। बेहद चैंकाने वाली है। आखिर क्या भारत के नागरिकों में राष्ट्रीय एकता की भावना इतनी भी नहीं रही कि ये देशद्रोही नारे लगाने लगे हैं। 

जिस देश में हरा रंग केसरिया रंग के साथ मिलकर एक अलग सुंदरता बिखेरता है उस देश के टुकड़े करने की बात की जाती है और फिर ये बात करने वाले कहां गायब हो जाते हैं किसी को पता ही नहीं चलता। आखिर ऐसा किस तरह से हो सकता है। कहीं यह किसी तरह की राजनीतिक साजिश तो नहीं है। देश की राजनीति को विभाजन के विचारों से प्रेरित कर देश को कमजोर किया जा रहा है।

पहले ही देश कई तरह की परेशानियां झेल चुका है अब वैचारिक क्रांति के जनक विश्वविद्यालयों को इस तरह की राजनीति से प्रेरित कर राजनेता किस तरह की आग लगाना चाहते हैं यह तो समझ से परे है लेकिन इसके परिणाम बेहद खतरनाक होंगे इसमें कोई संशय नहीं है। 

'लव गडकरी'