“सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन”

भारतीय सिनेमा जगत आज विश्व मे सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री बनकर उभर रहा है, बड़ी खुशी की बात है। भारतीय सिनेमा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फिल्मे बना रहा है और क्रय-विक्रय कर रहा है, आज हम विभिन्न विदेशी भाषाओं पर भी महारत हासिल कर रहे है, नए-नए विदेशी कल्चर सीख रहे है। ब्लैक एंड व्हाइट जमाने से निकलकर रंगीन सिने जगत मे नयी ऊंचाइयों को छु रहे है। एक जमाना गुरुदत्त साहब और राज कपूर साहब का था जिनकी फिल्मों मे अश्लीलता का कहीं नामो-निशान नहीं था, और ये एक जमाना है महेश भट्ट और सन्नी लियोने का जिनकी फिल्मे बिना अश्लीलता के बनती ही नहीं। आज आलम यह है कि आप अपने परिवार के साथ बैठकर सिनेमा हॉल मे फिल्म नहीं देख सकते और तो और TV पर यानि छोटे पर्दे के भी यही हाल है।

प्रश्न यह उठता है कि आखिर सेंसर बोर्ड कि स्थापना क्यूँ की गई? सेंसर बोर्ड के मेम्बर और अध्यक्ष क्यूँ ऐसी फिल्मों को हरी झंडी दे देते है? जिस भारतीय संस्कृति की दुनिया कायल है, जिसके गुणगान सारे जहां मे गाये जाते है। आज क्यूँ हम इस भारतीय संस्कृति को धूमिल और अश्लील बनाते जा रहे है? क्यूँ अश्लीलता को फेशन का लबादा पहनाकर भारतीय समाज और संस्कृति को गुमराह कर रहे है?

अगर सब कुछ एसा ही चलता रहा और इस पर लगाम ना लगाई तो एक दिन यहाँ इस पावन हिंदुस्तान पर फिर अंग्रेजों का राज होगा और हम फिर से उन्ही गुलामी की जंजीरों मे जकड़ लिए जाएँगे। अंत मे कहने को बस यही रह जाएगा कि “अब पछताए का होत, जब चिड़िया चुग गई खेत”।

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