हम कल भी अंतरिक्ष जानते थे, हम आज भी अंतरिक्ष जानते हैं

भारत एक ऐसा देश जिसके बारे में यह कहा जाता था कि यह देश क्या कभी एक सुई भी योरपीय देशों की सहायता के बिना बना सकता है. इसे वह देश माना जाता था जिसे सौ वर्षों से भी अधिक समय तक ब्रिटिशों ने जमकर लूटा। इसे किवदंतियों में जीने वालों का देश कहा जाता था. वह देश जो कि सपेरों का देश था. सपेरों का यह देश अब स्पेस शटल भेजने वालों का देश बन रहा है. जी हां, भले ही हम भारतीय कथित तौर पर पिछड़े हुए थे लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं कि हम ग्रह, गोचर, तारामंडलों की अंतरिक्ष में होने वाली हलचल को काफी पहले ही जान लेते थे।

इसका असर आज भी हमारे ज्योतिषीय ज्ञान में देखने को मिलता है. यही नहीं हम कई तरह की आकाशीय हलचल के मानव, प्राणियों पर होने वाले परिणामों और सदियों के कालक्रम को पहले से ही ज्ञात कर लेते हैं, मगर अब तो हम आधुनिक विज्ञान के साथ विश्व पटल पर खड़े हैं. जी हां, आज आधुनिक रूप से हमने इतने कृत्रिम उपग्रह लॉन्च कर दिए हैं कि विश्व में खगोलीय दृष्टि से हम महत्वपूर्ण हो गए हैं. भारत ने कई देशों के कृत्रिम उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया. इतना ही नहीं भारत ने जीपीएस तकनीक जैसा नेविगेशन सैटेलाईट भी प्रक्षेपित किया।

यह बेहद महत्वपूर्ण था. मंगल मिशन अपने आप में एक अलग मिशन रहा. मगर अब तो भारत अंतरिक्ष में आत्मनिर्भरता के नए पायदान छू रहा है. भारत अपने स्पेस सेंटर से ऐसा शटल छोड़ेगा जिसे व्हीकल टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर अंतरिक्ष में स्थापित कर धरती पर वापस आएगा. यह स्देशी निर्मित तकनीक का कमाल है. यदि ऐसा होता है तो फिर भारत भी विभिन्न देशों के सैटेलाईट्स को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करेगा. भारत इस दिशा में चीन से आगे निकल जाएगा. ऐसे में चीन के लिए एक बड़ी चुनौती होगी. भारत एशिया में ज्ञान आधारित शक्ति के तौर पर स्थापित होगा तो योरपीय देश भी अंतरिक्ष विज्ञान में इसका लौहा मानेगें।

'लव गडकरी'

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