अपना असली रंग खोता श्री गणेश चतुर्थी त्यौहार

आखिरकार सभी की प्रतीक्षा को विराम लग गया श्रद्धालुओं की श्रद्धा परवान चढ़ने को है। घड़ी श्री गणेश स्थापना की आने को है। जी हां, गुरूवार से दस दिवसीय श्री गणेशोत्सव की शुरूआत हो रही है। जिसे लेकर बच्चों की टोलियों में उत्साह है तो नेताओं के समर्थकों का दल भी तैयार है। यही नहीं बाजार भी गणेशोत्सव की धूम से गुलजार हो रहा है। हां इस सबके बीच श्री गणेशोत्सव पर्व का उद्देश्य भी बदला - बदला सा नज़र आने लगा है। जी हां, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने राष्ट्र जागरण के जिस उद्देश्य से इस समारोह की स्थापना की थी यह समारोह अब इससे काफी अलहदा हो गया है।

अब तो गणेश चतुर्थी में भी प्रोफेशनलिज़्म की झलक देखने को मिल रही है। गणेश पांडालों में बड़ी - बड़ी गणेश प्रतिमाऐं स्थापित करने की होड़ मची रहती है। अब तो व्यापारिक संगठन और राजनीतिक दल अपने प्रचार के लिए इसमें भी पूरी ताकत झोंक देते हैं। राजनीतिक दलों द्वारा अपने समर्थकों के साथ ही बड़े पैमाने पर धन इस आयोजन में लगाया जाता है। इससे जनता के बीच इनका प्रचार होता है।

सबसे ज़्यादा खर्चा मूर्ती के निर्माण और इसकी स्थापना पर होता है इसके बाद फिर जगह - जगह अपने प्रचार के होर्डिंग्स लगवा दिए जाते हैं। होर्डिंग्स पर बड़े नेता से ज़्यादा तो इनके समर्थक ही कब्जा जमाए होते हैं। इन होर्डिंग्स में गणेश जी को एक छोटा सा कोना दे दिया जाता है। पांडालों में दस दिन तक खासी धूम रहती है। लाईटिंग, पांडाल, डेकोरेशन और प्रतिस्पर्धाओं में विजेताओं को ईनाम बांटने के नाम पर नेता तारीफे बटोरते हैं। 

मगर सामुदायिक पहल कहीं नज़र नहीं आती। जिस गणेशोत्सव को देश को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए प्रारंभ किया गया था वह सांप्रदायिक उन्माद में बदलता जा रहा है। कई शहर तो ऐसे हैं जहां गणेशोत्सव के पांडाल लगाने के नाम पर ही सांप्रदायिक तनाव फैलने लगता है और फिज़ा खराब हो जाती है। ऐसे में इस उत्सव को सामुदायिक सद्भाव के तौर पर आगे बढ़ाने की पहल करने की जरूरत है। 

अब तो लोगों के व्यवहार में भी रूखापन झलकने लगा है। पारिवारिक एकता का अभाव इस पर्व के अवसर पर भी खलता है। घरों में लोग अपनी - अपनी सुविधा के अनुसार श्रीगणेश की स्थापना करते हैं और पहले की तरह अब परिवारों में सामूहिक गणेश स्थापित नहीं किए जाते। 

समुदाय के क्षेत्र से आगे निकलकर यह उत्सव राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने वाला बन सके ऐसे प्रयास करने की जरूरत है। फिर इस उत्सव को लेकर शोर - शराबा और दिखावा भी सामने आने लगा है। इससे भी लोग परेशान रहते हैं। इसे दूर करने और धार्मिक मान्यताओं को वैज्ञानिकता का चश्मा पहनाने की भी लोग जरूरत महसूस करते हैं। हालांकि बीते वर्षों में इको फ्रेंडली गणेश स्थापना से धार्मिकता के साथ वैज्ञानिकता के समावेश को बल मिला है लेकिन गणेश प्रतिमाओं के आकार में लगी होड़ थमना पर्यावरण के लिए हितकर है। 

"लव गडकरी"

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