बढ़ते अपराध और बेलगाम अपराधी, जिम्मेदार कौन ?

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक अपराधो का कला साया फैलता जा रहा है . यह बहुत ही घातक अशुभ संकेत है. विश्वगुरु के नाम से विख्यात भारत संगीन अपराधो के कारण कुख्यात होता जा रहा है . प्रतिदिन अपराधो की इबारते लिखी जा रही है . खून कि होली खेली जा रही है, हत्यायो, बलात्कारो, की घटनाओ में निर्बाध रूप से वृद्धि हो रही है. इन अपराधो के कारण चारो तरफ अराजकता का बोलबाला होता जा रहा है. देश में अपराधो का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है.

भारतीय संस्कृति का जामा पहनाकर महिलाओ को पूजनीय की उपाधि दी जाती है लेकिन उन्ही महिलाओ की अबरू को बड़ी ही बेरहमी से नोच लिया जा जाता है. यह कैसी संस्कृति है.

हमारी सरकार सुरक्षा की बात करती है लेकिन सामने आ रही वारदातों की खबरों ने इन दावो की पोल खोलकर रख दी है. कभी कभी तो हत्यायो की ऐसी वारदातों को अंजाम दिया जाता है जिनके बारे में सुनकर आत्मा सिहर उठती है. अपराध की बुनियाद अब इतनी फैलने लगी है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को धराशायी करने का प्रयास किया जा रहा है. झारखण्ड और बिहार के सीवान में 24 घंटे के भीतर दो पत्रकारों को मौत के घाट उतर दिया जाता है.

केंद्र और प्रदेश सरकार अपराधो को को रोकने के बजाय इन हत्यायो पर एक दुसरे को दोष देने लग जाती है. देश में जिस तरह से अपराधो में इजाफा हो रहा है उससे कानून व्यवस्था का जनाजा निकलता जा रहा है. देश के प्रत्येक राज्यों में अपराध अपनी जड़े फैला चूका है.

महानगरो से लेकर गाँव तक अपराधो में बढ़ोतरी चिंताजनक है. यह बढ़ोतरी इस बात की घोतक है कि अपराधियों के मन में पुलिस व कानून व्यवस्था का खौफ बिलकुल नही है. तुलनात्मक रूप से देखा जाये तो आज बड़े महानगरो व शहरो में ज्यादा अपराध हो रहे है. समाज में शान्ती का वातावरण बनाये रखने के लिए उसे अपराध मुक्त होना परम आवश्यक है.

अतः प्रत्येक देश की सरकार का प्रथम कर्तव्य है की वह समाज को और देश को वाह्य एवं आन्तरिक नकारात्मक शक्तियों से मुक्त रखने के लिए समुचित व्यवस्था करे. समाज को अपराध मुक्त रखने के लिए अपराध और अपराधी के मनोविज्ञान को समझना आवश्यक है,यदि अपराधी की मनोवैज्ञानिक प्रवृति का अध्ययन कर उसको मजबूर करने वाली परस्थितियों को बनने से ही रोक दिया जाय, तो समाज को अपराधमुक्त करना अथवा न्यूनतम अपराध वाले समाज की श्रेणी में लाने में मदद मिल सकती है.

लेकिन, अपने राजनैतिक हितों को साधने के लिए सत्ताधारी नेता स्थानीय समस्याओं को जान बूझ कर उलझा देते हैं और परिणाम स्वरूप धरना प्रर्दशन,हिंसक आन्दोलन या फिर आतंकवाद पनपने लगते हैं. जिससे स्थानीय विकास अवरुद्ध हो जाता है,देश में अलगाव जैसी समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं. अतः यह जानना आवश्यक है की देश और समाज को विकास की उन्मुक्त धारा से जोड़े रखने के लिए समाज को अपराधमुक्त कैसे रखा जा सकता है.

"संदीप मीणा "

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