पशु संरक्षण को लेकर ऐसा भेदभाव क्यों?

भारत की संस्कृति प्रारंभ से ही प्रकृति पालक की रही है। हमारी संस्कृति में वन, पर्यावरण, प्राणि, वायु, जल को सहेजने की बात कही गई है। यदि हम प्राचीन भारत के जीवन पर दृष्टि डालें तो हम देखते हैं कि यहां पर जीवन संस्कृति कबिलों में बंटी हुई थी। कबिलों के अपने चिन्ह हुआ करते थे। जो कि पशुओं या पक्षियों पर आधारित होते थे। इस माध्यम से इन पशुओं के जीवन को सहेजने का संदेश सभी को दिया जाता है। हालांकि प्रारंभ में मानव ने जब खेती करना नहीं सीखा था तब मानव मांसाहार से ही जीवित रहा था लेकिन उस दौर में भी वन्य जीवन का रक्षण मानव का प्रमुख कार्य भी था।

सारनाथ के अशोक स्तंभ से हमें बैल के माध्यम से और शेर के चारों मुखों के माध्यम से पशुओं के महत्व और उनके जीवन को सहेजने का महत्व मिलता है. हमारे देश के ऋषि- मुनियों को अक्सर आपने शेरों के साथ देखा होगा. कई बौद्ध भिक्षु भी अपने मठों के आसपास शेरों के साथ देखे जाते हैं. ऐसे ही एक संत सिंहस्थ 2016 के दौरान उज्जैन पधारे. पूरे आयोजन के दौरान इनके पांडाल में इनके साथ आया एक चिंकारा अर्थात काला हिरण विचरण करता रहा।

मगर जब ये वापस लौटे तो मार्ग में वन विभाग द्वारा इनके चिंकारा को पकड़ लिया गया बाद में इसे न्यायालय के आदेश पर चिड़ियाघर भेज दिया गया. हालांकि न्यायपालिका के निर्णय का सम्मान सभी को करना होता है. यह हमारे लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और न्यायालय कई बार महत्वपूर्ण निर्णय भी देते हैं. ऐसे में हम न्यायालय के किसी भी निर्णय की तुलना नहीं कर रहे हैं और न ही माननीय न्यायालय के निर्णय की भत्सर्ना कर रहे हैं।

मगर बाबा नीलगिरी जो कि महाराष्ट्र के एलोरा क्षेत्र के जंगल में रहते हैं वे एक संत हैं उनका नागा संस्कार सिंहस्थ में हुआ था. उन्होंने एक काले हिरण को उसकी प्रारंभिक अवस्था से ही पाला और अपने साथ सिंहस्थ लेकर आए. संत श्री नीलगिरी महाराज इस चिंकारा को प्रेमपूर्वक पालना चाहते थे मगर नियमों का हवाला देकर चिंकारा को पकड़ कर चिड़िया घर भेज दिया गया. हालांकि इस मामले में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम और अन्य नियमों के तहत कार्यवाही स्वाभाविक तौर पर की गई मगर जब हम एक फिल्म स्टार द्वारा वर्ष 1998 में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान कथित तौर पर शिकार करने के मामले पर नज़र डालते हैं तो उस क्षेत्र के विष्नोई समाज के विरोध के बाद भी इस अभिनेता के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही नहीं की जाती।

यहां पर नियम-कानून कमजोर पड़ जाते हैं आखिर एक वन्य जीव को लेकर नियमों में कड़ाई और शिथिलता की बात क्यों सामने आती है. क्या एक साधु या एक संत जो कि जंगलों में विचरण कर एकाकी जीवन जीते हैं वे अपने साथ जंगल के वातावरण में ही एक चिंकारा को प्रेमपूर्वक नहीं रख सकते. क्या चिंकारा वन में प्राकृतिक माहौल में किसी चिडिया घर से अपेक्षाकृत स्वस्थ्य नहीं रहता. यदि साधु महात्मा पर कार्यवाही ही की जानी थी तो फिर सिंहस्थ के दौरान चिंकारा की जब्ती क्यों नहीं की गई. यह भी एक बड़ा सवाल सामने आता है. बहरहाल वन्य जीवों को लेकर बरते जाने वाले इस तरह के नियमों पर कई तरह के सवाल उठते हैं।

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