इस बार बजट पर पड़ सकती है कोरोना की परछाई, टूटेगी 73 साल पुरानी परंपरा

By Emmanual Massey
Jan 22 2021 09:39 AM
इस बार बजट पर पड़ सकती है कोरोना की परछाई, टूटेगी 73 साल पुरानी परंपरा

आखिरकार कोविड-19 की परछाई 73 वर्ष पुरानी बजट परंपरा पर भी पड़ चुकी है। आजाद हिन्दुस्तान में 26 नवंबर, 1947 को पहली बार बजट के रूप में वित्तीय लेखाजोखा पेश किया जा चुका था। तब से संसद में पेश होने वाले बजट की छपाई का चलन है, लेकिन इस साल यह परंपरा टूटती हुई नज़र आ रही है। जिस कारण से बजट छपाई की औपचारिक शुरुआत से पहले इस बार वित्त मंत्रालय में हलवा की खुशबू भी नहीं फैलेगी।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पहली फरवरी को सॉफ्ट कॉपी से पेश करेंगी बजट: जंहा इस बात का पता चला है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इस बार पहली फरवरी को सॉफ्ट कॉपी से बजट पेश करने वाली है। सांसदों को भी बजट की हार्ड कॉपी यानी छपी हुई प्रति नहीं दी जाने वाली है। बजट के अतिरिक्त इस वर्ष आर्थिक सर्वे की भी छपाई नहीं की जा रही है। इन परंपराओं को इसलिए तोड़ना पड़ रहा है क्योंकि बजट की छपाई अति गोपनीय तरीके से की जाती है। छपाई के बीच एक साथ 50 से अधिक कर्मचारी वित्त मंत्रालय के नॉर्थ ब्लॉक में निरंतर 15 दिनों तक अपने घर-परिवार से पूरी तरह दूर एक साथ रहते हैं, जो  कोविड के इस दौर में संभव नहीं है। बजट की छपाई में लगने वाले कर्मचारियों को बाहर निकलने की इजाजत देने से बजट के लीक होने की आशंका रहेगी। जंहा यह भी कहा जा रहा है कि इन तमाम पहलुओं को देखते हुए इस बार बजट को छापने की जगह उसे पूरी तरह से सॉफ्ट रूप में पेश किया जाने वाला है।

हम बता दें कि बजट छपाई की गोपनीयता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इस प्रक्रिया में शामिल कर्मचारियों को संसद में बजट पेश होने के उपरांत घर जाने दिया जाता है। इस बीच वित्त मंत्रालय के प्रंटिंग प्रेस में उन्हें मोबाइल फोन तक रखने की इजाजत नहीं होती। वे सिर्फ आपात स्थिति में ही किसी से बात करने वाले है। इन सभी कर्मचारियों के खाने-पीने व रहने के इंतजाम के लिए कुछ अन्य कर्मचारी भी नॉर्थ ब्लॉक में रहते हैं।  जिससे छपाई के दौरान भीड़ होने वाली है। कोविड-19 संक्रमण को देखते हुए सरकार किसी प्रकार का जोखिम नहीं ले सकती है। वैसे, पिछले कुछ वर्षो से बजट की छपी हुई प्रतियों की संख्या काफी कम कर दी गई है। विशेषज्ञों के अनुसार  छपाई भले ही कम हो रही थी, लेकिन बजट छपाई की परंपरा का क्रेज अब भी बरकरार था।

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