कोशिश करो जीवन बदलो

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती। नन्ही चींटी जब दाना लेकर चलती है, चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है। मन का विश्वास रगों में साहस भरता है, चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती कोशिश करने वालों की हार नहीं होती। जी हां, । लोकप्रिय कवि डाॅ. हरिवंशराय बच्चन की कविता की इन पंक्तियों में जीवन का ऐसा ही रस छुपा हुआ है दरअसल यह है तो महज़ कविता की कुछ पंक्तियां लेकिन वास्तविकता से मेल खाता है। जीवन का यही दर्शन हमें हर बात में मिलता है। यदि हम श्रीमद्भवगद् गीता के सार तत्व को भी लें तो उसमें भी कर्म की प्रधानता बताई गई है। अर्थात् हमें किसी भी स्थिति में कार्य तो करना ही होता है।

यदि हम उस कार्य को करते हैं तो शायद कार्य सफल हो जाता है लेकिन जब हम वह कार्य करते ही नहीं हैं तो वह असफल ही होता है। उसमें हमारी अनुपस्थिति होने से हम स्वयं को पहले ही हारा हुआ जान लेते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि किसी प्रतिस्पर्धा में अपेक्षाकृत कमजोर खिलाड़ी सशक्त खिलाड़ी के सामने खेलने से चोट का बहाना कर देता है और प्रतिस्पर्धा में उसका सामना नहीं करता तो वह अपनी हार को पहले ही स्वीकार कर लेता है ऐसे में उसने कर्म तो किया ही लेकिन अपनी हार को स्वयं ही निमंत्रण दे दिया। जी हां, उसने किस तरह से कर्म किया पहले तो यह समझ लें। दरअसल प्रतिस्पर्धा में भागीदारी न करने का उसने निर्णय लिया और निर्णय को ही कर्म रूप में सामने र खा। यदि वह खिलाड़ी खेल भावना से मैदान में उतरता और कड़े संघर्ष के बीच हार भी जाता तो संभवतः परिणाम ये होते कि कड़े संघर्ष के बाद चोटी के खिलाड़ी को मिली सफलता। ऐसे में उस खिलाड़ी के खेल कौशल की भी सराहना की जाती।

यही नहीं जीवन में ऐसे कई अवसर आते हैं जब हम निराशा से घिर जाते हैं, ऐसे में अवसादग्रस्त हो जाने पर वह कार्य हमें बहुत कठिन लगता है। ऐसा लगता है जैसे कि हमारे सामने पहाड़ जैसा लक्ष्य रख दिया गया है और हम उसके सामने बेहद बौने हैं। मगर सबसे पहले हम यह विचार करते हैं कि मैं यह नहीं करूंगा तो हम खाली बैठे रह जाते हैं और यह सोचते हैं कि यह कार्य कैसे हो सकता है। इस स्थिति में हम एक जगह रह जाते हैं। जीवन में इस तरह का ठहराव उस रूके हुए पानी की तरह है जो बहुत जल्दी खराब हो जाता है। मगर फिर हम अपने मन को तैयार करते हैं निश्चय करते हैं और नकारात्मक चिंतन को अपने उपर हावी होने देते हैं और सोचते हैं कि यह काम हम नहीं कर सकते तो यह संभव ही नहीं हो पाता है। ऐसे में हम पहले ही हार को गले लगाने लगते हैं। लेकिन जब हम यह विचार करते हैं कि इस काम को हम करना चाहते हैं तब मन में कुछ निश्चय उठता है, कार्य करने को लेकर हम तैयार होते हैं और ऐसे में हम उस कार्य को काफी कुछ कर पाते हैं। इस स्थिति में आगे हम यह सोच सकते हैं कि यह कार्य किस युक्ति से किया जाए।

यहां आध्यात्मिक चेतना भी काम करने लगती है यदि हम नित्य ध्यान करते हैं तो वह चेतना जागृत होती है और हम इसके लिए प्रयास करने के लिए अग्रसर होते हैं। इस तरह के प्रयास में जब कुछ सफलता मिलती है तो हमें आत्म विश्वास नज़र आने लगता है। पूरे उत्साह से जब हम यह काम करते हैं तो हम यह सोचते हैं कि इस काम को किया जा सकता है और निश्चयपूर्वक इस कार्य को करने पर सफलता जरूर मिलती है। उदाहरण के तौर पर कुछ ग्रामीणों ने गांव में आवागमन के लिए कोई पक्का रास्ता न होने पर रास्ता बनाने की बात की। इस दौरान कुछ लोगों का कहना था कि हम कैसे सड़क बना सकते हैं आखिर यह सरकार का काम है, हमारे पास न तो रूपया है और न ही सामान कैसे सड़क बनाऐंगे।

यह हमसे नहीं होगा और हम इसे नहीं करेंगे लेकिन पंचायत की सभा में कुछ लोगों ने यह तय कर लिया कि इसे हमें करना ही है यह हम कर सकते हैं तो उन्होंने तय किया कि सड़क किस तरह बनेगी। क्या वह कच्ची होगी। उसके लिए किस तरह से मुरम की जरूरत होगी। किस तरह से पत्थर और बोल्टर आऐंगे और चैन बनाकर कैसे श्रमदान करेंगे। जब वे एक साथस मिलकर सड़क बनाने का काम करते हैं तो उन्हें यह काम बेहद आसान लगता है और वे इसमें सफलता प्राप्त कर लेते हैं। इसके बाद उन्हें बेहद खुशी होती है कि उन्होंने गांव के विकास में अपना योगदान दिया है मगर वे लोग पछतावा जताते हैं जो ये सोचकर हट जाते हैं कि यह काम उनका नहीं था वे यह काम नहीं कर सकते हैं।

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