माया के फेर में उलझते बाबा

सिंहस्थ 2016 का सफल आयोजन हो गया. करोड़ों श्रद्धालु सिंहस्थ के दौरान मोक्षदायिनी शिप्रा, और पुण्यसलिला नर्मदा में डुबकी लगाकर अपने घरों को जा चुके हैं. इन श्रद्धालुओं ने साधु- संतों के दर्शन किए और अपने जीवन को धन्य माना. सिंहस्थ के समापन के बाद जब साधु- संतों के पांडालों को समेटने का समय आया तब यह बात सामने आई कि अपने साथ स्वर्ण सामग्री लेकर आने और करोड़ों रूपए की संपत्तियां रखने वाले बाबाओं पर सामान्य ठेकेदारों, मजदूरों का बकाया है. ये लोग जब बकाया मांगने बाबाओं के पास पहुंचे तो बाबाओं ने इन लोगों को टरका दिया। उनसे अभद्रता की।

अब सवाल ये उठ रहे हैं कि सिहस्थ में अपनी भव्यता प्रदर्शित करने वाले और अपने भव्य पांडालों के माध्यम से सुर्खियों में आए बाबाओं को माया का मोह कब से लग गया? जबकि वे तो संत बनकर दुनिया के मायावी चक्कर से दूर हो चुके हैं. वे ऐसी शक्तियां प्राप्त कर चुके हैं जिसके आगे सोना- चांदी का कोई मोल नहीं मगर इसके बाद भी पांडाल लगाने वाले और उनके कैंप में कई तरह के व्यवस्था करने वाले कारीगरों, कारोबारियों को उनके बकाया का भुगतान तक नहीं दिया गया।

बाबा बनकर एकाकी जीवन बीताने वाले और लोगों का भला करने की बात करने वाले साधु गरीब मजदूरों का भला नहीं कर पाए. पेशवाई में स्वर्ण मुकुट से मंडित होने वाले और खुद को ठोकने वाले बाबा कहने वाले बाबाओं पर लोगों के लाखों करोड़ो रूपए बकाया बताए जा रहे हैं. इस वर्ष सिंहस्थ का एक ऐसा स्वरूप देखने को मिला जिसमें असंतुष्ट बाबाओं की भरमार रही. जबकि उनकी साधना उन्हें शांति, सद्भाव और संतुष्टि के मार्ग पर ले जाती है।

वे आम लोगों की तरह कभी जमीन के लिए कभी अखाड़े के चुनाव के लिए तो कभी स्वयं के प्रभुत्व के लिए आपस में लड़ते रहे. ऐसे बाबाओं का रूतबा साधारण लोगों की तरह नज़र आया लेकिन उनकी भव्यता से और लोकप्रियता के फेर में लोग उनके पांडालों में पहुंच रहे थे. हालांकि कुछ बाबा ऐसे भी थे जो इन सभी आडंबरों से दूर मानव सेवा कर रहे थे. इनके पांडालों में अन्नक्षेत्र बिना किसी स्वार्थ के संचालित हो रहे थे तो ये अपनी साधनाओं में लीन थे. मगर ऐसे साधु- पुरूषों की खोज काफी कठिन रही।

 

'लव गडकरी'

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