कहानी उस 'गायक' की, जिसे शोमैन राज कपूर मानते थे अपनी 'आत्मा'

Jul 22 2021 09:44 AM
कहानी उस 'गायक' की, जिसे शोमैन राज कपूर मानते थे अपनी 'आत्मा'

22 जुलाई 1923 को जन्मे मशहूर गायक मुकेश ने सन् 1945 में संगीत की दुनिया में पदार्पण किया था। उसके बाद के तीन दशकों तक वो बेहद लोकप्रिय रहे। उन्होंने फिल्मी और गैर फिल्मी गानों के साथ ही उर्दू, पंजाबी और मराठी गानों को भी अपनी आवाज से सजाया। ‘मेरे सामने दस हल्के गीत हों, एक उदासी से भरा हो, तो मैं दस गीत छोड़ दूंगा और उदास गीत को चुनूंगा।’ यह कहना था, मुकेश चंद्र माथुर का, जो आज तक सबके लिए मुकेश के रूप में ही पर्याप्त हैं, किन्तु प्रतिभा का उत्कर्ष देखें... उदासी भरे गीतों के लिए नर्म दिल रखने वाले मुकेश ने हर तरह के गीत गाए और बेहद शानदार तरीके से गाए।

मुकेश की आवाज हर शख्स को इतना खुश कर देती है कि वह भी गुनगुना उठे। किसी आवाज में आमंत्रण की यह कशिश काफी कम देखने को मिलती है। राज कपूर ऐसे ही उन्हें अपनी आवाज नहीं बताते थे। राज कपूर ने कहा था कि, ‘अगर मैं जिस्म हूं तो मुकेश मेरी आत्मा।’ बेशक मुकेश ने हर संगीतकार के साथ काम किया, जिनमें नौशाद, कल्याण जी-आनंद जी, खय्याम, लक्ष्मीकांत-प्यारे लाल जैसे नाम शामिल हैं, किन्तु शंकर-जय किशन के साथ उनकी जो जुगलबंदी बनी, राज कपूर, नर्गिस दत्त उस अमिट इतिहास के गवाह हैं। ‘रमैया वस्तावैय्या’, ‘आवारा हूं’, ‘मेरा जूता है जापानी’ जैसे कई गीत अब भी लोगों को मदहोश करते रहते हैं।

प्रसंगवश भारत में ‘मेरा जूता है जापानी’ जैसे गीत को खास अवसरों पर तो बजता था, किन्तु आकाशवाणी से इसके प्रसारण पर रोक थी। तरुण श्रीधर लिखते हैं कि, ‘1950 के बाद तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री डा. बालकृष्ण विश्वनाथ केस्कर ने संस्कृति प्रदूषित होने के भय के चलते फिल्मी गीतों के प्रसारण पर रोक लगा रखी थी।’

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