जल रंगोली - दिवाली रंगोली विशेष !!

परंपरा और विशेषताओं से समृद्ध भारत में रंगोली धार्मिक, सांस्कृतिक,आध्यात्मिक आस्थाओं की प्रतीक रही है। इसको आध्यात्मिक प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण अंग माना गया है।तभी तो विभिन्न हवन एवं यज्ञों में 'वेदी' का निर्माण करते समय भी माँडने बनाए जाते हैं। ग्रामीण अंचलों में घर-आँगन बुहारकर लीपने के बाद रंगोली बनाने का रिवाज आज भी विद्यमान है। मुख्यतः रंगोली” रेती, चावल का आटा,फूलों और पत्तियों से बनी कलाकृति है, जो भारत में ओणम, दिवाली, नवरात्र, जैसे शुभ त्योहारों के मौके पर, घर/मंदिर के सामने भूमि पर बनाई जाती है।

आजकल रंगोली के लिए कलाकारों ने पानी को भी माध्यम बना लिया है। इसके लिए एक टब या टैंक में पानी को लेकर स्थिर किया जाता है।  पानी को हवा या किसी अन्य तरह के संवेग से वास्ता न पड़े इसकी पूरी कोशिश की जाती है । इसके बाद चारकोल के पावडर को छिड़क दिया जाता है। भरे हुए पानी पर ,रेती, फूलों की पंखुडियों और दियों की सहायता से भी रंगोली बनाई जाती है। पानी सतह पर रंगों को रोकने के लिए चारकोल की जगह, डिस्टेंपर या पिघले हुए मोम का भी प्रयोग किया जाता है। कुछ रंगोलियाँ पानी के भीतर भी बनाई जाती हैं। इसके लिए एक कम गहरे बर्तन में पानी भरा जाता है फिर एक तश्तरी या ट्रे पर अच्छी तरह से तेल लगाकर रंगोली बनाई जाती है। बाद में इसपर हल्का सा तेल स्प्रे कर के धीरे से पानी के बर्तन की तली में रख दिया जाता है। तेल लगा होने के कारण रंगोली पानी में फैलती नहीं।

आइये स्लाइड्स में देखते है पानी की सतह और पानी के भीतर बनी ऐसी ही कुछ रंगोली इस दिवाली विशेष अंक में 

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