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आखिर टीपू की जयंती पर लड़ाई का क्या अर्थ !
आखिर टीपू की जयंती पर लड़ाई का क्या अर्थ !

भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। वह राष्ट्र जहां समय - समय पर कई संस्कृतियों ने आकर अपने आप को और भी विकसित किया। भारत को लेकर विदेशियों में जबरदस्त आकर्षण रहा। कई विदेशी आक्रमणकारी भारत की इस धरती पर अपने घोड़ों, हाथियों और दलबल के साथ पहुंचे। कुछ शक्तियों का समय के प्रभाव के चलते अंत हो गया तो कुछ ने इस राष्ट्र को अपना लिया। उन्होंने इस जन्नत की तरह देखा और सरजमींन ए हिंदोस्तां का नाम दिया। वे यहीं के होकर रह गए। इन्हीं में से एक थे मुगल। यूं तो तुर्कों के बाद मुगलों का आगमन हुआ और वे यहां  के होकर रह गए। हालांकि इतिहास में मुगलों को भी मस्जिदों, खूबसूरत ईमारतों, कुंओं के निर्माणों और अन्य भलाई के कार्यों के लिए भी जाना जाता है लेकिन इसे लेकर विवाद भी है कि मुगलों ने देश की संस्कृति को छिन्न - भिन्न कर दिया। मुगलों को कुछ पक्षों द्वारा विध्वंसकारी माना जाता है लेकिन इतिहास के पन्नों को देखा जाए तो वे कला, संस्कृति, साहित्य के पौषक भी थे।

मुगल भारत पर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहते थे इसके लिए वे यहां की मराठा, राजपूत, पल्लव, चोल, चालुक्य आदि शक्तियों से संघर्ष करते थे। इन मुगलों में अलग - अलग क्षेत्रों के शासक थे। इन्हीं सुल्तानों में से एक था टीपू सुल्तान जिसका पूरा नाम सुल्तान फतेह अली खान शाहाब था। मगर उन्हें उनके पिता ने शेर ए मैसूर की उपाधि दी थी। टीपू को लेकर जो ज्ञात इतिहास मिलता है उसमें यह दर्शाया गया है कि उन्होंने मराठों, अंग्रेजों आदि शक्तियों से लड़ाईयां लड़ीं। मगर प्रमुख तौर पर उन्हें मैसूर को बचाने के लिए अंग्रेजों से लड़ने वाला माना जाता है।

हाल में मैसूर के सुल्तान टीपू सुल्तान की जयंती को लेकर कर्नाटक में विवाद हो गया। इस मसले पर हिंदूवादी संगठन और मौजूदा सरकार दो धड़ों में बंट गए। हिंदूवादी संगठनों ने यह आरोप लगाते हुए जयंती मनाने का विरोध किया कि टीपू सुल्तान एक असहिष्णु शासक था। उसने हिंदूओं पर कई अत्याचार किए थे। इस दौरान कर्नाटक में प्रदर्शन हुए। उग्र आंदोलन के दौरान हिंसा भड़क उठी और पुलिस गोलीबारी में एक युवक की जान चली गई। इतिहास के पन्ने को कुरेदते - कुरेदते कर्नाटक में आधुनिक भारत का एक दिन बिगड़ गया।

वह दिन काला हो गया। टीपू की जयंती को लेकर बवाल करने वालों और जयंती मनाने वालों के बीच विवाद ऐसा गहराया कि माहौल गहमागहमी भर हुआ। साहित्यकारों के आंदोलन और बीफ मसले से देश को कुछ राहत मिली थी कि टीपू को लेकर लोग लड़ने लगे। आखिर टीपू की जयंती मनाने और न मनाने से किसे क्या हासिल होना था। मगर इसका राजनीतिकरण करने के बाद देशभर में अराजकता की स्थिति बनने लगी। खबरिया चैनलों ने इस पर संवाद की तो वहां ऐसा माहौल हो गया जैसे राजनेता एक दूसरे को मारने दौड़ेन वाले हैं।

जब स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के तौर पर देखा जाने लगा है तो फिर इस बात पर विवाद क्यों किया जा रहा है कि टीपू की जयंती मनाई जानी चाहिए या नहीं। दरअसल टीपू सुल्तान ने उन अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी जो भारत को अपना उपनिवेश बनाकर चले गए। ऐसे में विदेशी आक्रमणकारियों के खिलाफ लड़ने वाले टीपू को वीर कहे जाने में कोई संशय नहीं।

जहां तक ज्ञात इतिहास की बात है। टीपू सुल्तान पर निर्मित धारावाहिक द साॅर्ड आॅफ टीपू सुल्तान में एक ब्राह्मण पंडित पुर्णिया पंडित को टीपू सुल्तान का दरबारी बताया जाता है जो उन्हें सलाह - मश्विरा देते हैं। ऐसे में टीपू को असहिष्णु कहा जाना गलत है। टीपू सुल्तान ने कई तरह के अच्छे कार्य भी किए हैं। हालांकि इतिहास के इस पन्ने को उलटने और शासकों की जयंती -  पुण्यतिथि पर लड़ने के स्थान पर यह देखा जाना चाहिए कि आखिर वर्तमान में उनकी जयंती मनाई जाती है तो उसका राज्य को कितना लाभ मिल सकता है।

राज्य में विध्वंसक गतिविधियों को अंजाम दिए जाने के स्थान पर यहां के पर्यटन को विकसित करने के लिए मैसूर के सुल्तान रहे टीपू की जयंती का आयोजन कारगर साबित हो सकती है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कहते हैं कि पर्यटक स्थलों में पर्यटन बढ़ाए जाने से आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं ऐसे में टीपू की जयंती राज्य के लिए आर्थिक विकास का एक नया मार्ग हो सकती है। बजाय इस पर राजनीतिक संघर्ष करने के इस जयंती को राज्य की आर्थिक तरक्की का अवसर बनाया जाए तो अधिक उचित हो सकता है।

फिर इतिहास के इतने पुराने पन्ने को उलटने से कोई लाभ नहीं होगा। यदि इस क्षण में जीकर टीपू की जयंती बनाई जाए तो यह कर्नाटकवासियों और देशवासियों के लिए सृजनात्मक होगा। क्योंकि मह ही कहते आ रहे हैं मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना। यदि टीपू की जयंती पर बवाल किए जाऐं। उपद्रव किया जाए तो यह किसी भी राज्य या देश को काफी पीछे धकेल सकता है। यह बात गौर करने लायक है कि उपद्रवों और वैमनस्य के चलते विकास बहुत पीछे हो जाता है फिर विकास की पटरी पर आने में वर्षों लग जाते हैं। 

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