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बहुत लोकप्रिय है विदुर नीति का यह श्लोक

Nov 13 2019 09:00 PM
बहुत लोकप्रिय है विदुर नीति का यह श्लोक

महाभारत के मुख्य पात्रों में से विदुर का नाम भी आता हैं. महाभारत के युद्ध के समाप्त होने के बाद जीवित बचे व्यक्तियों में से विदुर भी शामिल थे और वह अपने ज्ञान और कौशल के कारण ही स्वयं को महाभारत के युद्ध से अलग रखने में सफल हुए थे. ऐसे में युद्ध खत्म होने के बाद वह युधिष्ठिर के महामंत्री नियुक्त किए गए हे. आपको बता दें कि विदुर की नीतियां शुक्राचार्य और आचार्य चाणक्य की तरह प्रसिद्ध है और वह समय-समय पर धृतराष्ट्र को अनेक ही उदाहरणों को देकर सही राह दिखाने का काम करते थे. वह हर बात एक श्लोक द्वारा धृतराष्ट्र को समझाते थे. उनका कहना था कि मनुष्य का व्यवहार कब कैसा होना चाहिए और यही बात आज हम आपको विदुर नीति से बताने जा रहे हैं.

श्लोक - षडेते ह्यमन्यते नित्यं पूर्वोपकारिणाम.. आचार्य शिक्षिताः शिष्याः कृतदारश्र्च मातरम् .. नावं निस्तीर्णकान्तारा आतुराश्र्च चिकित्सकम्..

अर्थ - विदुरजी ने कहा हैं कि शिक्षा गृहण करने के बाद शिष्य गुरु का अपमान करता हैं जब तक उसे अपने गुरु से शिक्षा मिलती हैं तब तक वह उनका सम्मान करता हैं जब उसे लगता हैं. कि अब गुरु के पास देने को कुछ भी नहीं हैं तो वह उसी गुरु का अपमान करता हैं जिससे उन्होंने सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया हैं. शिक्षा गृहण करने के बाद कौरवों ने अनेक बार गुरु द्रोणाचार्य का अपमान किया, यह इसका एक बड़ा उदाहरण हैं. मां का स्थान मनुष्य के जीवन में ईश्वर से भी ऊंचा होता हैं मां हर समय बच्चों के साथ होती हैं व उसकी रक्षा करती हैं भगवान हर समय बच्चों के साथ नहीं रहता हैं. भगवान ने इस कमी को पूरा करने के लिए ही मां को बनाया हैं. मां अपने बच्चे की हर जिद को पूरा करती हैं व उसके लिए बड़े से बड़े खतरे को स्वयं ही सह लेती हैं. वही बच्चे का विवाह हो जाने के बाद वह पत्नी को अधिक महत्व देता हैं और मां का उसके जीवन में प्रभाव कम हो जाता हैं विवाह के बाद मां के सम्मान में कमी आ जाती हैं.

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