वाल्मीकि जयंती आज, जानिए रत्नाकर डाकू के 'रामायण रचियता' बनने की पूरी कहानी

आज देशभर में रामायण के रचनाकार आदिकवि महर्षि वाल्मीकि की जयंती मनाई जा रही है. महर्षि वाल्मीकि का जन्म अश्विन मास के शुक्‍ल पक्ष की पूर्णिमा यानी कि शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था. महर्षि वाल्‍मीकि की जयंती पूरे देश में काफी उत्साह के साथ मनाया जाता है.  पौराणिक कथाओं के मुताबिक, वैदिक काल के महान ऋषि वाल्‍मीकि पहले डाकू थे, किन्तु जीवन की एक घटना ने उन्हें बदलकर रख दिया. वाल्‍मीकि असाधारण व्यक्तित्व के धनी थे, शायद इसी कारण लोग आज भी उनकी जयंती पर कई विशेष कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं. 

वाल्मीकि जयंती शरद पूर्णिमा तिथि पर मनाई जाती है. पूर्णिमा तिथि के लिए पूजा का वक़्त 19 अक्टूबर को शाम 7 बजकर 3 मिनट से प्रारंभ है और आज रात 8 बजकर 26 मिनट पर ख़त्म होगा. वाल्मीकि जयंती को परगट दिवस के नाम से भी जाना जाता है. बता दें कि वाल्मीकि का जन्म महर्षि कश्यप और अदिति की 9वीं संतान वरुण और पत्नी चर्षणी के यहाँ हुआ था. बचपन में भील समुदाय के लोग उन्हें चुराकर ले गए थे और उनका पालन-पोषण भील समाज में ही हुआ. वाल्मीकि से पहले उनका नाम रत्नाकर हुआ करता था. रत्नाकर जंगल से आने-जाने वाले लोगों से लूट-पाट करता था. एक बार देवर्षि नारद जंगल से गुजर रहे थे, तो रत्नाकर ने उन्हें भी बंदी बना लिया. इसी दौरान देवर्षि नारद ने उनसे पूछा कि ये सब पाप तुम क्यों करते हो? इस पर रत्नाकर ने जवाब दिया कि, 'मैं ये सब अपने परिवार के लिए करता हूं'. नारद हैरान हुए और उन्होंने फिर उससे पूछा क्या तुम्हारा परिवार तुम्हारे पापों का फल भोगने के लिए राजी है. रत्नाकर ने निसंकोच हां में जवाब दिया.

तभी नारद मुनि ने कहा इतनी जल्दी जवाब देने से पहले एक बार परिवार के लोगों से तो पूछ लो. रत्नाकर घर आया और उसने परिवार के सभी सदस्यों से पूछा कि क्या कोई उसके पापों का फल भोगने के लिए तैयार है? सभी ने इनकार कर दिया. इस घटना के बाद रत्नाकर को बेहद दुखी हुआ और उसने सभी गलत काम छोड़ने का फैसला किया. इसके बाद वो राम के परम भक्त बन गए. सालों की तपस्या के बाद वो इतना शांत हो गए कि चींटियों ने उनके चारों तरफ टीले बना लिए. इसलिए, इन्हें महर्षि वाल्मीकि की उपाधि दी गई, जिसका मतलब होता है 'चींटी के टीले से पैदा हुआ.' 

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