इस ग्रंथ को सबसे प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है

दुनिया में श्रीराम पर लिखे गए सबसे ज्यादा ग्रंथ : रामायण को वा‍ल्मीकि ने श्रीराम के काल में ही लिखा था इसीलिए इस ग्रंथ को सबसे प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। यह मूल संस्कृत में लिखा गया ग्रंथ है। श्रीरामचरित मानस को गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा जिनका जन्म संवत्‌ 1554 को हुआ था। गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीरामचरित मानस की रचना अवधी भाषा में की।

तमिल भाषा में कम्बन रामायण, असम में असमी रामायण, उड़िया में विलंका रामायण, कन्नड़ में पंप रामायण, कश्मीर में कश्मीरी रामायण, बंगाली में रामायण पांचाली, मराठी में भावार्थ रामायण।
 
कंपूचिया की रामकेर्ति या रिआमकेर रामायण, लाओस फ्रलक-फ्रलाम (रामजातक), मलेशिया की हिकायत सेरीराम, थाईलैंड की रामकियेन और नेपाल में भानुभक्त कृत रामायण आदि प्रचलित हैं। इसके अलावा भी अन्य कई देशों में वहां की भाषा में रामायण लिखी गई है।
 
दुनियाभर में 300 से ज्यादा रामायण प्रचलित हैं। उनमें वाल्मीकि रामायण, कंबन रामायण और रामचरित मानस, अद्भुत रामायण, अध्यात्म रामायण और आनंद रामायण की चर्चा ज्यादा होती है। उक्त रामायण का अध्ययन करने पर हमें रामकथा से जुड़े कई नए तथ्‍यों की जानकारी मिलती है।
 
पुस्तकें और ग्रंथ : नेपाल, लाओस, कंपूचिया, मलेशिया, कंबोडिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका, बाली, जावा, सुमात्रा और थाईलैंड आदि देशों की लोक-संस्कृति व ग्रंथों में आज भी राम जिंदा हैं। दुनियाभर में बिखरे शिलालेख, भित्तिचित्र, सिक्के, रामसेतु, अन्य पुरातात्विक अवशेष, प्राचीन भाषाओं के ग्रंथ आदि से राम के होने की पुष्टि होती है।
 
रामायण : रामायण को वा‍ल्मीकि ने राम के काल में ही लिखा था इसीलिए इस ग्रंथ को सबसे प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। रामायण और महाभारत यही ग्रंथ मूलत: हिन्दू इतिहास और राम व कृष्ण की प्रामाणिक जानकारी देते हैं। यह मूल संस्कृत में लिखा गया ग्रंथ है। इसके अलावा पुराणों में वर्णित इतिहास को मिथकीय रूप में लिखा गया है जिसमें तथ्‍यों की क्रमबद्धता नहीं हैं। दरअसल, यह कर्मकांड और पूजा-पद्धतियों पर आधारित इतिहास-कथाएं हैं।
 
रामचरित मानस : रामचरित मानस को गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा जिनका जन्म संवत्‌ 1554 को हुआ था। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना अवधी भाषा में की। रामायण से अधिक इस ग्रंथ की लोकप्रियता है लेकिन यह ग्रंथ भी रामायण सहित अन्य ग्रंथों और लोक-मान्यताओं पर आधारित है।
 
अन्य भारतीय रामायण : तमिल भाषा में कम्बन रामायण, असम में असमी रामायण, उड़िया में विलंका रामायण, कन्नड़ में पंप रामायण, कश्मीर में कश्मीरी रामायण, बंगाली में रामायण पांचाली, मराठी में भावार्थ रामायण आदि भारतीय भाषाओं में प्राचीनकाल में ही रामायण लिखी गई।
 
विदेशी रामायण : कंपूचिया की रामकेर्ति या रिआमकेर रामायण, लाओस फ्रलक-फ्रलाम (रामजातक), मलयेशिया की हिकायत सेरीराम, थाईलैंड की रामकियेन और नेपाल में भानुभक्त कृत रामायण आदि प्रचलित हैं। इसके अलावा भी अन्य कई देशों में वहां की भाषा में रामायण लिखी गई है। इससे पता चलता है कि रामकथा और राम का प्रभाव संपूर्ण धरती पर था।
 
श्रीलंका : श्रीलंका के संस्कृत एवं पाली साहित्य का प्राचीनकाल से ही भारत से घनिष्ठ संबंध था। भारतीय महाकाव्यों की परंपरा पर आधारित 'जानकी हरण' के रचनाकार कुमार दास के संबंध में कहा जाता है कि वे महाकवि कालिदास के अनन्य मित्र थे। कुमार दास (512-21ई.) लंका के राजा थे। इसे पहले 700 ईसापूर्व श्रीलंका में 'मलेराज की कथा' की कथा सिंहली भाषा में जन-जन में प्रचलित रही, जो राम के जीवन से जुड़ी है।
 
बर्मा और कंपूचिया : बर्मा को पहले ब्रह्मादेश कहा जाता था। रामकथा पर आधारित बर्मा की प्राचीनतम गद्यकृति 'रामवत्थु' है। लाओस में रामकथा पर आधारित कई रचनाएं हैं जिनमें मुख्य रूप से फ्रलक-फ्रलाम (रामजातक), ख्वाय थोरफी, पोम्मचक (ब्रह्म चक्र) और लंका नाई के नाम उल्लेखनीय हैं।
 
कंपूचिया की रामायण को वहां के लोग 'रिआमकेर' के नाम से जानते हैं, किंतु साहित्य जगत में यह 'रामकेर्ति' के नाम से विख्यात है।
 
इंडोनेशिया और जावा : संपूर्ण इंडोनेशिया और मलयेशिया में पहले हिन्दू धर्म के लोग रहते थे लेकिन फिलिपींस के इस्लामीकरण के बाद वहां भी हिन्दुओं का जब कत्लेआम किया गया और फिर सभी ने मिलकर इस्लाम ग्रहण कर लिया।
 
फिलिपींस की तरह वहां भी रामकथा को तोड़-मरोड़कर एक काल्पनिक कथा का रूप दिया गया। डॉ. जॉन आर. फ्रुकैसिस्को ने फिलिपींस की मारनव भाषा में संकलित इक विकृत रामकथा की खोज की है जिसका नाम 'मसलादिया लाबन' है।
 
रामकथा पर आधारित इंडोनेशिया के जावा की प्राचीनतम कृति 'रामायण काकावीन' है। काकावीन की रचना कावी भाषा में हुई है। यह जावा की प्राचीन शास्त्रीय भाषा है। 
 
मलेशिया : मलयेशिया का इस्लामीकरण 13वीं शताब्दी के आस-पास हुआ। मलय रामायण की प्राचीनतम पांडुलिपि बोडलियन पुस्तकालय में 1633 ई. में जमा की गई थी। मलयेशिया में रामकथा पर आधरित एक विस्तृत रचना है 'हिकायत सेरीराम'। हिकायत सेरीराम विचित्रताओं का अजायबघर है। इसका आरंभ रावण की जन्म कथा से हुआ है। मलेशिया मूलत: रावण के नाना का आधिपत्य था। 
 
चीन और जापान : चीनी रामायण को 'अनामकं जातकम्' और 'दशरथ कथानम्' ने नाम से जाना जाता है। इनमें रामायण के हर पात्र के नाम अलग हैं और चीन में रामकथा के मायने भी अलग हैं। 'अनामकं जातकम्' और 'दशरथ कथानम्' के अनुसार राजा दशरथ जंबू द्वीप के सम्राट थे और उनके पहले पुत्र का नाम लोमो था।
 
चीनी कथा के अनुसार 7,323 ईसा पूर्व राम का जन्म हुआ। जापान के एक लोकप्रिय कथा संग्रह 'होबुत्सुशू' में संक्षिप्त रामकथा संकलित है। यह कथा वस्तुत: चीनी भाषा के 'अनामकं जातकम्' पर आधारित है, किंतु इन दोनों में अनेक अंतर भी हैं।
 
मंगोलिया :
चीन के उत्तर-पश्चिम में स्थित मंगोलिया के लोगों को रामकथा की विस्तृत जानकारी है। वहां के लामाओं के निवास स्थल से वानर-पूजा की अनेक पुस्तकें और प्रतिमाएं मिली हैं। मंगोलिया में रामकथा से संबद्ध काष्ठचित्र और पांडुलिपियां भी उपलब्ध हुई हैं।
 
दम्दिन सुरेन ने मंगोलियाई भाषा में लिखित चार रामकथाओं की खोज की है। इनमें 'राजा जीवक की कथा' विशेष रूप से उल्लेखनीय है जिसकी पांडुलिपि लेलिनगार्द में सुरक्षित है। जीवक जातक की कथा का 18वीं शताब्दी में तिब्बती से मंगोलियाई भाषा में अनुवाद हुआ था।
 
तिब्बत : तिब्बत में रामकथा को किंरस-पुंस-पा कहा जाता है। वहां के लोग प्राचीनकाल से वाल्मीकि रामायण की मुख्य कथा से सुपरिचित थे। तिब्बती रामायण की 6 प्रतियां तुन-हुआंग नामक स्थल से प्राप्त हुई हैं।
 
तुर्किस्तान : एशिया के पश्चिमोत्तर सीमा पर स्थित तुर्किस्तान के पूर्वी भाग को खोतान कहा जाता है जिसकी भाषा खोतानी है। एचडब्लू बेली ने पेरिस पांडुलिपि संग्रहालय से खोतानी रामायण को खोजकर दुनिया के सामने लाया।
 
चीनी की रामायण : भगवान श्रीराम और उनके जीवन का ‍दुनिया के हर क्षेत्र में गहरा प्रभाव पड़ा है। चीन में रामायण का एक अलग ही रूप है। रामायण के हर पात्र के नाम वहां अलग है और चीन में श्रीराम कथा के मायने भी अलग हैं। 'दशरथ कथानम्' के अनुसार राजा दशरथ जंबू द्वीप के सम्राट थे और उनके पहले पुत्र का नाम लोमो था।
 
हालांकि चीनी साहित्य में श्रीराम कथा पर कोई अलग से ग्रंथ नहीं है और न ही रामायण को संस्कृत से चीन में अनुवाद किया गया फिर भी श्रीराम कथा चीन में प्रसिद्ध है। चीन का मूल धर्म बौद्ध है। बौद्ध धर्म ग्रंथ त्रिपिटक के चीनी संस्करण में रामायण से संबद्ध दो रचनाएं मिलती हैं। पहली 'अनामकं जातकम्' और दूसरी 'दशरथ कथानम्'।
 
फादर कामिल बुल्के का नाम कौन नहीं जानता। उनके अनुसार तीसरी शताब्दी ईस्वी में 'अनामकं जातकम्' का कांग-सेंग-हुई द्वारा चीनी भाषा में अनुवाद हुआ था जिसका मूल भारतीय पाठ अप्राप्त है। चीनी अनुवाद लियेऊ-तुत्सी-किंग नामक पुस्तक में सुरक्षित है।
 
'अनामकं जातकम्' के रचनात्मक स्वरूप से इसके रामायण पर आधारित होने का पता चलता है, क्योंकि इसमें राम वन गमन, सीता हरण, सुग्रीव मैत्री, सेतुबंधष लंका विजय आदि प्रमुख घटनाओं का स्पष्ट वर्णन मिलता है। इसकी कथा पूर्णत: वाल्मीमि रामायण पर आधारित है। हालांकि इसकी कथा नायिका विहीन है।
 
नायिका विहीन 'अनामकं जातकम्' में जानकी हरण, वालि वध, लंका दहन, सेतुबंध, रावण वध आदि प्रमुख घटनाओं का वर्णन इसलिए नहीं मिलता क्योंकि चीन का धर्म अहिंसा पर आधारित है।
 
हालांकि 'दशरथ कथानम्' के अनुसार राजा दशरथ जंबू द्वीप के सम्राट थे। राजा की प्रधान रानी के पुत्र का नाम लोमो (राम)। दूसरी रानी के पुत्र का नाम लो-मन (लक्ष्मण) था। राजकुमार लोमो में ना-लो-येन (नारायण) का बल और पराक्रम था। उनमें 'सेन' और 'रा' नामक अलौकिक शक्ति थी तीसरी रानी के पुत्र का ना पो-लो-रो (भरत) और चौथी रानी के पुत्र का नाम शत्रुघ्न था। 
 
'दशरथ कथानम्' पूर्णत:
श्रीराम की कथा है जो चीन में प्रसिद्ध है। दोनों ही कथाओं में 'सीता हरण' का जिक्र न होने के काण सीता के बारे में सिर्फ सांकेतिक कथा ही है।

शिलालेख और भित्तिचित्र : राम के काल में संपूर्ण भारत (कश्मीर से ले‍कर कन्याकुमारी तक) और सीरिया, इराक, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार (बर्मा), लाओस, थाईलैंड, वियतनाम, कंबोडिया, मलेशिया, सुमात्रा, जावा, इंडोनेशिया, बाली, फि‍लिपींस, श्रीलंका, मालदीव, मारिशस आदि जगहों पर राम पताका फहराई जाती थी।

हिंदेशिया का नाम बिगड़कर इं‍डोनेशिया हो गया। यहां पहले वानर जाति का राज था। इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप का नामकरण सुमित्रा के नाम पर हुआ था। मध्य जावा की एक नदी का नाम सेरयू है और उसी क्षेत्र के निकट स्थित एक गुफा का नाम किस्केंदा अर्थात किष्किंधा है।

रामायणकाल के रहस्य
 
लाओस, कंपूचिया और थाईलैंड के राजभवनों तथा बौद्ध विहारों की भित्तियों पर उकेरी गई रामकथा चित्रावली आज भी संरक्षित है। लाओस के लुआ प्रवा तथा वियेनतियान के राजप्रसाद में थाई रामायण 'रामकियेन' और लाओ रामायण फ्रलक-फ्रलाम की कथाएं अंकित हैं।
 
लाओस का उपमु बौद्ध विहार रामकथा-चित्रों के लिए विख्यात है। थाईलैंड के राजभवन परिसर स्थित वाटफ्रकायों (सरकत बुद्ध मंदिर) की भित्तियों पर संपूर्ण थाई रामायण 'रामकियेन' को चित्रित किया गया है।
 
कंपूचिया की राजधानी नामपेन्ह में एक बौद्ध संस्थान है, जहां खमेर लिपि में 2,000 तालपत्रों पर लिपिबद्ध पांडुलिपियां संकलित हैं। इस संकलन में कंपूचिया की रामायण की प्रति भी है। 
 
थाईलैंड का प्राचीन नाम स्याम था और द्वारावती (द्वारिका) उसका एक प्राचीन नगर था। थाई सम्राट रामातिबोदी ने 1350 ई. में अपनी राजधानी का नाम अयुध्या (अयोध्या) रखा, जहां 33 हिन्दू राजाओं ने राज किया था।
 
थाईलैंड में लौपबुरी (लवपुरी) नामक एक प्रांत है। इसके अंतर्गत वांग-प्र नामक स्थान के निकट फाली (वालि) नामक एक गुफा है। कहा जाता है कि बालि ने इसी गुफा में थोरफी नामक महिष का वध किया था।
 
प्रशांत महासागर के पश्चिमी तट पर स्थित आधुनिक वियतनाम का प्राचीन नाम चंपा है। थाईवासियों की तरह वहां के लोग भी अपने देश को राम की लीलभूमि मानते है। उनकी मान्यता की पुष्टि 7वीं शताब्दी के एक शिलालेख से होती है जिसमें वाल्मीकि मंदिर का उल्लेख मिलता है जिसका पुनर्निमाण प्रकाश धर्म (653-679 ई.) नामक सम्राट ने करवाया था। शिलालेख इस मायने में अनूठा है, क्योंकि वाल्मीकि की जन्मभूमि भारत में भी उनके किसी प्राचीन मंदिर का अवशेष उपलब्ध नहीं है।
 
वियतनाम के बोचान नामक स्थान से एक क्षतिग्रस्त शिलालेख भी मिला है जिस पर संस्कृत में 'लोकस्य गतागतिम्' उकेरा हुआ है। दूसरी या तीसरी शताब्दी में उत्कीर्ण यह उद्धरण रामायण के अयोध्या कांड के एक श्लोक का अंतिम चरण है। संपूर्ण श्लोक इस प्रकार है-
 
क्रुद्धमाज्ञाय रामं तु वसिष्ठ: प्रत्युवाचह।
जाबालिरपि जानीते लोकस्यास्यगतागतिम्।।
अर्थात : वियतनाम के त्रा-किउ नामक स्थल से प्राप्त एक और शिलालेख यत्र-तत्र-क्षतिग्रस्त है। इसे भी चंपा के राजा प्रकाश धर्म ने खुदवाया था इसमें वाल्मीकि का स्पष्ट उल्लेख है-
 
'कवेराधस्य महर्षे वाल्मीकि'।
'पूजा स्थानं पुनस्तस्यकृत:'।
अर्थात : तात्पर्य यह कि महर्षि वाल्मीकि का एक प्राचीन मंदिर था जिसका प्रकाश धर्म ने पुनर्निर्माण करवाया।

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