सिर्फ भूखे-प्यासे रहना ही नहीं है रोज़ा

28 मई से इस्लामिक कैलेंडर का नवां महीना शुरू हो चुका है, ऐसे में इस्लाम धर्म को मानने वाले रोजे रखते हैं, जो की सबसे पवित्र माने जाते है. रोज़े में सूरज निकलने से पहले तक सहरी अदायगी होती है इस दौरान आप जो खाना चाहते है खा या पी सकते है. फिर सूरज डूबने के वक्त या फिर यूं कहे मगरिब की अजान होने पर ही रोजा इफ्तार होता है. ख़ास बात यह है कि रोज़े का मतलब दिन भर भूखे-प्यासे रहना ही नहीं बल्कि इस दिन आपको पानी नीयत और आत्मा को भी साफ रखना होता है.

अगर रोजा रखकर गलत काम करते है यानी झूठ बोलना, धोखा देना, बुराई करना, गलत निगाहों से दूसरों को देखते रहना या अन्य गंदे विचारों का दिमाग मे आते रहना तो इसका मतलब रोजा नहीं हुआ, यह सिर्फ फाका करना हुआ. न ही आपको इसका कोई पुण्य मिलेगा और न ही आपके रोज़े का कोई मतलब निकलेगा.

यही नहीं बल्कि रोजे के दौरान पति-पत्नी को भी आपस मे संबंध बनाने की मनाही है. रमज़ान के इस पवित्र महीने में आप आप जितने अच्छे काम कर सकते है उतने करने चाहिए. जैसे कि यदि आप जरुरतमंदो को खाना खिलाते है, दान देते है, रोजदारों को इफ्तार करवाते है, तो ऐसे में अल्लाह की बरकत पाने में आपको मदद मिलती है, साथ ही आपका रोजा भी सफल होता है.

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