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मनुष्य के व्यक्तित्व का जन्म संस्कारो से हुआ है

मनुष्य के व्यक्तित्व का जन्म संस्कारो से हुआ है

एक गर्भवती सिंहनी पहाड़ से छलांग लगाती हे बीच में ही बच्चा हो गया और वह बच्चा नीचे गिर गया। नीचे से भेड़ों का एक झुंड निकल रहा था, वह बच्चा भेड़ों के साथ हो लिया। उस शेर के बच्चे ने बचपन से ही अपने को भेड़ों के बीच पाया और अपने को भेड़ ही जाना। तो जानने का उपाय क्या था ? इसी तरह तो तुमने अपने को हिंदू जाना है, मुसलमान जाना है, सिख जाना है, जैन जाना है। और तुम्हारे जानने का उपाय क्या है ? जिन भेड़ों के बीच पड़ गए, वही तुमने अपने को जान लिया है। उन भेड़ों ने जो किताब पकड़े थीं, वहीं तुमने भी पकड़ ली हैं। तुम्हारे व्यक्तित्व का अभी जन्म ही कहां हुआ ? जैसे वह सिंह का बच्चा भेड़ होकर रह गया। भेड़ों जैसा मिमियाता । भेड़ों के साथ घसर-पसर चलता। भेड़ों के साथ भागता। और भेड़ों ने भी उसे अपने बीच स्वीकार कर लिया। उन्हीं के बीच बड़ा हुआ। उन्हें कभी उससे भय भी नहीं लगा। कोई कारण भी नहीं था भय का। वह सिंह शाकाहारी रहा।

जिनके साथ था, भेड़ें भागती तो वह भी भागता। एक दिन ऐसा हुआ कि एक सिंह ने भेड़ों के इस झुंड पर हमला किया। वह सिंह तो चौंक गया। वह यह देख कर चकित हो गया कि यह हो क्या रहा है। उसे अपनी आंखों पर भरोसा न आया। सिंह भाग रहा है भेड़ों के बीच में! और भेड़ों को उससे भय भी नहीं है, घसर-पसर उसके साथ भागी जा रही हैं। और सिंह क्यों भाग रहा है ? उस बूढे सिंह को तो कुछ समझ में नहीं आया। उसका तो जिंदगीभर का सारा ज्ञान गड़बड़ा गया। उसने कहा, यह हुआ क्या ? ऐसा तो न देखा न सुना। न कानों सुना, न आंखों देखा। उसने पीछा किया। और भेड़ें तो और भागीं। और भेड़ों के बीच जो सिंह छिपा था, वह भी भागा। और बड़ा मिमियाना मचा और बड़ी घबड़ाहट फैली। मगर उस बूढे सिंह ने आखिर उस जवान सिंह को पकड़ ही लिया।

वह तो मिमियाने लगा, रोने लगा। कहने लगा छोड़ दो, मुझे छोड़ दो, मुझे जाने दो। मेरे सब संगी साथी जा रहे हैं, मुझे जाने दो। मगर वह बूढा सिंह उसे घसीट कर उसे नदी के किनारे ले गया। उसने कहा, मूरख! तू पहले देख पानी में अपना चेहरा। मेरा चेहरा देख और पानी में अपना चेहरा देख, हम दोनों के चेहरे पानी में देख। जैसे ही घबड़ाते हुए, रोते हुए आंखें आंसुओ से भरी हुईं, और मिमिया रहा है, लेकिन अब मजबूरी थी, अब यह सिंह दबा रहा है तो देखना पड़ा उसने देखा, बस देखते ही एक हुंकार निकल गई। एक क्षण में सब बदल गया। वे तसव्वुर में यकायक आ गए। हिज्र की सूरत बदल कर रह गई एक क्षण में क्रांति हो गई, भेड़ गई सिंह जो था, वही हो गया। ऐसे ही तुम हो। तुम्हें भूल ही गया है तुम कौन हो। तुमने दोस्ती बगुलों से बना ली है। तुमने दोस्ती झूठ से कर ली है। तुमने झूठ के खूब घर बना लिए हैं। और झूठ के घर जब तक तुम्हें घर मालूम होते हैं, असली घर की तलाश नहीं हो सकती ।