भारतीय एकता का प्रतीक स्टेच्यू आॅफ यूनिटी
भारतीय एकता का प्रतीक स्टेच्यू आॅफ यूनिटी
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एक भारत श्रेष्ठ भारत के संकल्प के साथ आखिरकार लौह पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल की आदमकद प्रतिमा निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ। अब यह काम तेज़ी से चल रहा है और संभावना जताई जा रही है कि करीब 3 माह में सरदार सरोवर बांध के नज़दीक इस प्रतिमा का निर्माण कार्य पूरा हो जाएगा। यूं तो भारत जैसे सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में महापुरूषों की प्रतिमा बनवाने और उन्हें लगवाने की बात कोई नई नहीं है। एक तरह से यह नेताओं के प्रचार - प्रसार का शगूफा ही हो गया है। कई बार प्रतिस्पर्धी दलों में अपनी - अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व करने वाले महापुरूषों की प्रतिमा स्थापना को लेकर विवाद तक हो जाते हैं। बसपा प्रमुख मायावती ने तो प्रतिमा निर्माण के मामले में सभी को पीछे छोड़ दिया है। उन्होंने स्वयं की जीवंत प्रतिमा अनावरण कर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की सीमा ही लांघ दी।

मगर जब बात भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश को नए सांचे में ढालने वाले नेताओं की हो तो स्वाभाविकतौर पर सभी का सिर श्रद्धानवत हो जाता है। लोग स्वयं ही इन महापुरूषों का सम्मान करते हैं। ऐसे ही महापुरूषों में एक हैं सरदार वल्लभ भाई पटेल, जिन्होंने स्वतंत्र भारत को नए तरीके से गढ़कर उसे लोकतंत्र के सूत्र में गूंथा। छोटी - बड़ी रियासतों के तौर पर अलग हुए क्षेत्रों को प्रांतों के रूप में पिरोकर सरदार पटेल ने भारत माता के गले की सुंदर माला तैयार की। इस कार्य को करने के लिए उन्हें न जाने कितनी कठिनाईयों से गुज़रना पड़ा लेकिन बावजूद इसके उन्होंने गणों के राज्य भारत को एक प्रजातांत्रिक गणराज्य में बदला।

बात कश्मीर नरेश के विरोध की हो या फिर इन स्टेट को प्रांत में बदलने की हो। लौह पुरूष ने हर मोर्चे पर लौहा लिया। इसी का नतीजा है कि आधुनिक भारत आज तक अखंड रहा है। लौह पुरूष सरदार पटेल के इस दृष्टांत में महान कूटनीतिज्ञ और अर्थशास्त्री चाणक्य के दर्शन होते हैं। जिसमें उन्होंने संकल्पना की थी कि यदि भारत को विदेशी आक्रमणों से बचाना है तो उसे एक छत्र राष्ट्र के तौर पर गठित करना होगा। जिसमें एक प्रधान हो और शेष राजा उसके अधीन होकर अपने - अपने क्षेत्र में स्वतंत्र राज्य करें। कुछ इसी तरह की संकल्पना लौह पुरूष ने भारत की संघीय व्यवस्था में देखी और रियासतों का विलय कर प्रांतों से भारत का निर्माण किया।

इस संकल्पना की स्मृति को बनाए रखने के लिए भारत सरकार ने लौह पुरूष सरदार पटेल की पुण्यतिथि पर एकता के लिए दौड़ लगाई गई तो देशभर की करीब 1.87 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों से लौहा लेकर जैसे ही ट्रक रवाना हुए। ऐसा लगा जैसे आज भी भारत की ग्राम्य शक्ति जीवंत है और गांव फिर से एक क्रांति के लिए तैयार हैं। सच ही तो है श्वेत क्रांति से लेकर प्रत्येक क्रांति गांवों से ही होकर शहरों तक पहुंची है। किसानों ने अपने परिवार के लौह पुरूष को निराश नहीं किया और उनकी प्रतिमा निर्माण के लिए तादाद मे लौहा दान दिया। यह प्रयास भारत की अनेकता में एकता के दर्शन ही तो करवाता है।

जिस तरह से देशभर में इस स्टेच्यू के लिए एक साथ दौड़ लगाई गई उसने भारत के प्रत्येक नागरिक को एक साथ खड़ा कर दिखाया। यह केवल स्मारक ही नहीं है यह आशाओं, विचारों और भारत की एकता का केंद्र बिंदू है। इस स्मारक से भारत की अखंडता को प्रभावित करने वाले विचार कमजोर होते नज़र आते हैं। जिसकी आज सबसे ज़्यादा जरूरत महसूस की जाती रही है। जिस तरह से अलग खालिस्तान की मांग को नकार दिया गया, उसी तरह से बोडो लैंड की मांग भी धीमी पड़ गई।

इससे साबित हो गया है कि भारत के नागरिक कितने ही भेद रखते हों लेकिन ऐसे समय में सभी एक हो जाते हैं। जम्मू - कश्मीर में अलगाववादियों द्वारा लगातार भावनाऐं भड़काने के प्रयास किए जाते रहे हैं लेकिन ऐसे प्रयास स्टेच्यू आॅफ यूनिटी की संकल्पना के सामने बौने साबित हो रहे हैं। स्टेच्यू आॅफ यूनिटी देशवासियों के लिए केवल लौह स्मारक नहीं है बल्कि एक पवित्र स्तंभ की तरह है। जो इस देश की आत्मा को केंद्रित किए हुए है।

 
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