11वे रोज़े के साथ शुरू होगा मगफिरत का अशरा

किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी मगफिरत (मोक्ष) की बात कही गई है. हर धरम में मोक्ष के अलग-अलग नाम और नीतियां होती है, उसी प्रकार इस्लाम धर्म में भी मोक्ष के लिए तक़्वा (संयम/सत्कर्म) बहुत ही अहम होता है. तक़्वा इख्तियार करने के लिए रोज़ा रखना ज़रूरी है, और रोज़ा यानी सीधा अल्लाह से वास्ता. रोज़ा ही होता है इस्लाम में मगफिरत का रास्ता, जिसके ज़रिए आप अपने गुनाह माफ़ करवाते हैं और अल्लाह की बेशुमार इबादत करते हैं.

आपकी जानकारी एक लिए बता दें कि रमज़ान के पाक महीने के ग्यारहवे रोज़े से मगफिरत का अशरा शुरू हो जाता है. यह अशरा बीसवे रोज़े तक चलता है. इस दूसरे अशरे को मगफिरत का अशरा इसिलए कहा जाता है, क्योंकि इस में अल्लाह से माफ़ी और मगफिरत की दुआ की जाती है. रमज़ान के महीने में हर तरह की बुराई से बचते हुए सिर्फ अल्लाह की इबादत की जाती है अपने हर गुनाहों की माफ़ी मांगते हुए मगफिरत की तलब की जाती है.

धर्म-ग्रन्थ कुरआन पाक में भी इस बात का ज़िक्र है कि, "बेशक जो लोग अपने परवर दिगार से बिना देखे डरते हैं, उनके लिए मगफिरत (मोक्ष) और अज़्रे-अज़ीम (महान पुण्य) मुकर्रर है." कुरआन की आयत पर गौर किया जाए तो देखा जा सकता है कि इबादत के प्लेटफॉर्म पर मगफिरत की ट्रेन के लिए दरअसल ग्यारहवां रोज़ा सिग्नल है. क्योंकि ग्यारहवे रोज़े के साथ ही रमज़ान का दुसरा अशरा शुरू होता है.

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