सांप्रदायिकता की आग में नफरत का घी डाल माहौल गर्म कर रहे सियासतदार

इन दिनों देशभर में एक ही मसला जोरों पर छाया हुआ है। दादरी उपद्रव के बाद तो जैसे नेताओं की जुबान पर बस इस मसले का ही नाम था। बीफ को बैन करने के मामले में इस तरह की राजनीति चल निकली कि देशभर में माहौल गर्म हो गया। गुजरात में पोस्टर प्रचार से उपजा विवाद दादरी में उपद्रव के तौर पर सामने आया। इसके बाद भी नेताओं द्वारा बयानबाजियों का दौर जारी है। रहरहकर यह मामला विवादों में उठ रहा है। पीडि़त परिवार को मुआवज़ा तो मिल गया मगर हादसे का असर अभी भी उनके जीवन पर देखने को मिल रहा है। नेताओं द्वारा लगातार कट्टरपंथी और हिंदूवादी बयानबाजी की जा रही है।

इससे माहौल गर्मा रहा है। एक ओर केंद्र सरकार देश को विकास के पायदान पर ले जाने की बात करती है तो दूसरी ओर देश को उपद्रव की आग में झोंकने का कार्य किया जाता है। नेताओं द्वारा बाबरी विध्वंस की बात कर आग में घी डालने का कार्य किया जा रहा है। धर्म और संप्रदाय की आग में देश को झोंककर विकास को दरकिनार कर दिया गया है। कभी चर्च के नाटक को प्रतिबंधित किया जाता है तो कभी गरबों में गैर हिंदूओं के प्रवेश को वर्जित कर दिया जाता है। इस तरह की भावनाऐं भड़काने की बात कर नागरिकों के मन में भय और अराजकता का माहौल पैदा कर नेता अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं।

मगर इस तरह के फौरी फायदे में देश को फिर से दंगों का लंबा दंश न झेलना पड़े। इसके लिए सद्भाव की बेहद आवश्यकता है। हालांकि अब काफी लोग इन बातों को समझकर सियासी फायदों वाली बातों से अपना पल्ला झाड़ने लगे हैं लेकिन सांप्रदायिकता की आग में नफरत का घी डालकर माहौल गर्म करना अभी भी जारी है। 

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