अद्भुत रहस्य समेटे होता है नागा साधुओं का जीवन !

उज्जैन : सिंहस्थ के इस आयोजन में आम श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हैं साधु - संत। श्रद्धालु अलग - अलग तरह की साधनाऐं करने वाले साधुओं को देखने उमड़ रहे हैं। इन साधुआं की साधनाऐं देखकर लोगों को आश्चर्य हो रहा है तो कोई साधु महात्माओं की जटाओं को लेकर अचरज जता रहे हैं। ऐसे में लोगों के कौतूहल और आकर्षण का केंद्र नागा साधु ही बने हुए हैं। इन नागा साधुओं की साधनाऐं हमेशा से ही लोगों को आकर्षित करती रही है। लोग इनकी साधनाओं, इनके श्रृंगार को लेकर आकर्षित रहते हैं।

वैसे नागा सन्यासी भस्म को ही अपनी देह पर धारण करते हैं। इसी के साथ इनके कुछ नियम भी होते हैं। नागा सन्यासी धर्म के रक्षक कहे जाते हैं। ये साधु अखाड़ों के तहत रहते हैं। यूं तो नागा साधु शिव या रूद्रावता भगवान दत्तात्रेय को ही अपना आराध्य मानते हैं लेकिन वैष्णव संप्रदाय के भी अखाड़े होते हैं। ऐसे 13 अखाड़े प्रमुख हैं जिन्हें मान्यता दी गई है जिसमें 7 शैव अखाड़े हैं तो 3 वैष्णव और 3 उदासीन अखाड़े हैं। इन अखाड़ों की पूजन - पद्धति बेहद अलग - अलग है।

श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा - जूना अखाड़ा का अर्थ होता है पुराना। यह सबसे पुराना अखाड़ा है। यह अखाड़ा भगवान श्री दत्तात्रेय को अपना इष्ट मानता है। इस अखाड़े के कई साधु बेहद लोकप्रिय हैं। इस अखाड़े में सबसे अधिक महामंडलेश्वर हैं। यहां देशी - विदेशी साधु - साध्वियां भी हैं। इनमें विदेशी और महिला महामंडलेश्वर भी प्रमुख हैं। अटल अखाड़ा - इस अखाड़े की स्थापना 569 ईवी में गोंडवाना में हुई थी। भगवान श्री गणेश इनके आराध्य माने गए हैं। इनका प्रमुख पीठ पाटन में ही माना गया है।

श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा - वर्ष 646 में यह अखाड़ा स्थापित किया गया। 1603 में फिर से इस अखाड़े का गठन किया गया। इस अखाड़े के संत श्री दत्तात्रेय और श्री गणेश जी को आराध्य मानते हैं। निरंजनी अखाड़ा - यह अखाड़ा बेहद लोकप्रिय है। इस अखाड़े में कई शिक्षित महामंडलेश्वर हैं। इसके आराध्य भगवान कार्तिकेय स्वामी हैं। अखाड़े की स्थापना गुजरात के मांडवी में हुई थी। महानिर्वाणी अखाड़ा - इस अखाड़े के साधुओं को बारह ज्योर्तिलिंग में से एक और उज्जैन के श्री महाकालेश्वर की भस्मारती में भस्म रमाने का अधिकार है।

इस अखाड़े द्वारा इस मंदिर के प्रथम तल पर प्रतिष्ठापित श्री नागचंद्रेश्वर मंदिर में भी प्रथम पूजन किया जाता है। उल्लेखनीय है कि यह मंदिर वर्ष में केवल एक बार ही खुलता है। इसके अलावा भी कई अखाड़े हैं। जिनमं आनंद अखाड़ा शैव अखाड़ा है। निर्मोही अखाड़ा वैष्णव संप्रदाय का अखाड़ा है, निर्वाणी अणि अखाड़ा, बड़ा उदासीन अखाड़ा निर्मल अखाड़ा, दिगंबर अणि अखाड़ा आदि प्रमुख हैं। इनमें उदासीन का अर्थ यह है तो है कि वे उदासीन भाव से संसार से विरक्त होकर भगवान की आराधना करते हैं अर्थात् ये साधनाऐं करते हैं और जीवन के आकर्षण के प्रति उदासीन रहते हैं।

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